आज का समाज इतना दूषित हो चूका हैं कि हमारे मन साफ़ रखने से कुछ नहीं होगा। चाहे वो स्त्री हो या पुरुष। हम सिर्फ ये कह कर नहीं छोड़ सकते हैं कि वो बड़ा हैं, क्योंकि ये वहशी, दरिंदे बड़े ही होते हैं, बच्चों के केस तो काम ही दिखते हैं। जीरो टॉलरेंस पर हम सब को रहना चाहिए, कानून तो पहले से ही मौजूद हैं। एक किस्सा बताती हूँ एक दिन एक स्कूल बच्ची हमारे साथ ऑटो में बैठी और एक बेहद ही बुजुर्ग सज्जन पहले से थे, बच्ची उनके बगल में बैठी, उन्होंने बच्ची के पैरों पर हाथ रखा, जब तक मैं बोलती, वो चिल्ला पड़ी...... ये क्या बदतमीज़ी है.... मैंने तो ये देख लिया था, सज्जन बोले बद्तमीज़ लड़की चुप कर... मैंने क्या किया है और साथ में पुरुष सज्जन भी बोले बहुत बदतमीज़ है बड़ों से बोलने की तमीज़ नहीं.... अब बारी मेरी थी.... 100 no डायल किया और पास के पुलिस स्टेशन पर ऑटो रुकवा लिया और बोली चलो ... बताते हैं बड़ों से बात करने की तमीज़.... बुजुर्ग सज्जन भाग लिए। तो ये तर्क बिलकुल ना दे कि वो बड़ा है जाने दो.....
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