Friday, March 27, 2026

मधु पूर्णिमा किश्वर के आरोप की सच्चाई

मधु पूर्णिमा किश्वर जिन्होंने 2014 के चुनाव से ठीक पहले श्री नरेंद्र मो दी की नकारात्मक छवि को ठीक करने के लिए लेखों की एक सीरीज और किताब मो दीनामा नाम से लिखी और वह काफी चर्चा में आई उन्होंने नकारात्मक इमेज को सही करने की बखूबी कोशिश की और उसके बाद ही मो दी केंद्रीय सत्ता में आए। अब वही लेखक अपने ट्वीट के माध्यम से मो दी सरकार की आलोचना करती हुई नजर आ रही है । उन्होंने सुप्रीम स्वामी के एक ट्वीट को रीट्वीट करते हुए उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं और उनके आरोपों के ट्वीट का अनुवाद इस प्रकार हैं....

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मई 2014 में मो दी के सत्ता में आने के बाद से ही मैंने उनसे सेफ़ दूरी क्यों बनाए रखी। मैं तो उन्हें उन पर लिखी अपनी किताब की एक कॉपी गिफ़्ट करने भी नहीं गयी।
बस उनके पसंदीदा ब्यूरोक्रेट भरत लाल के ज़रिए एक बिना साइन की कॉपी भेजी!
जिन महिलाओं को मो दी ने अपने करीबी होने की वजह से MP और मंत्री बनाया था, उनके नाम शुरू से ही संघी पावर नेटवर्क में काफ़ी ज़ोर-शोर से फुसफुसा रहे थे। इसीलिए मैंने बहुत पहले ही सावधानी बरती।

हर दीप पुरी जैसे लोगों के नाम, जिन्होंने गुजरात के CM रहते हुए उन्हें स्पेशल सर्विस दी थी, भी दबी आवाज़ में शेयर किए जाने लगे, जैसे ही हरदीप और जयशंकर को कैबिनेट में शामिल किया गया!

2014 में, जब मैं अमेरिका लेक्चर देने गयी, तो वहाँ भी उनकी अय्याशी के किस्से चल रहे थे।

12वीं पास स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री बनाने से दूसरे स्कैंडल को बढ़ावा मिला जो तब तक छिपे हुए थे। मानसी सोनी से जुड़ा स्कैंडल पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुका था।

मो दी के किसी करीबी ने मुझे सुप्रीम कोर्ट में जेल में बंद IAS ऑफिसर के जमा किए गए पेपर्स का पूरा सेट दिया, जो सोनी के साथ मज़े कर रहा था।

इसके अलावा, गुजरात के लोगों ने, जिनमें मो दी के कुछ करीबी भी शामिल थे, मेरे साथ गुजरात के CM रहते हुए महिलाओं के साथ उनके बुरे रिश्तों की घिनौनी कहानियाँ शेयर कीं। और इससे पहले जब वह प्रचारक और BJP के ऑफिस बेयरर थे!

उन कहानियों को सुनकर, मुझे उनकी मौजूदगी से इतनी नफ़रत हो गई कि मैं उन फंक्शन्स में भी नहीं जाती, जिसमें शादी के रिसेप्शन भी शामिल थे, जहाँ मो दी के आने की संभावना थी!

उन भयानक कहानियों से मैं इतना सदमे में थी कि 2014 में मैं असल में गहरे डिप्रेशन में चला गयी थी, जिसका मेरी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा। 2015 में कई शॉक से ठीक होने की उम्मीद में कोयंबटूर के एक आयुर्वेदिक हीलिंग सेंटर में 21 दिनों के लिए गई थी ।

मुझे याद है जब मैंने RSS के एक बहुत सीनियर इंटलेक्चुअल के साथ सुनी रिपोर्ट्स पर अपना दुख शेयर किया, तो उन्होंने यह कहकर टाल दिया, "आप इतने शॉक्ड क्यों हैं? उनकी पर्सनल लाइफ से हममें से किसी को क्या दिक्कत होनी चाहिए?"
#पोर्नपेडलर अमित मालवीय को BJP का सोशल मीडिया इंचार्ज बनाना BJP के टॉप बॉस के झुकाव का एक और सबूत था! अगर उन्होंने दूसरे मोर्चों पर अच्छा काम किया होता, तो मैं उनके शिकारी सेक्सुअल कंडक्ट को नज़रअंदाज़ कर देता।

लेकिन नरसंहार वाली वैक्सीन को तेज़ी से बेचना और हिंदू समाज को कुचलने और हिंदू धर्म को बुरा बताने की खुली कोशिशें, हिंदुओं पर जानलेवा हमले करने के लिए भीमता और मीमता को उनका ज़बरदस्त सपोर्ट, ग्लोबलिस्ट माफिया के साथ उनका गुलाम जैसा बर्ताव, कठुआ कांड के दौरान  हिंदुओं पर ज़ुल्म (जिसके बारे में मेरी किताब 'द गर्ल फ्रॉम कठुआ, ए सैक्रिफ़िशियल विक्टिम ऑफ़ ग़ज़वा-ए-हिंद' में डिटेल में बताया गया है) और भी बहुत कुछ, ने मुझे पहले टर्म में ही एहसास करा दिया था कि हम एक शैतानी शासक, एक CIA प्लांट के साथ हैं जिसे भारत को बर्बाद करने और हिंदुओं को खत्म करने के लिए सत्ता में लाया गया है!

मो दी के पर्सनैलिटी डिसऑर्डर ने मुझे यकीन दिलाया है कि हमें अपने नेताओं के सेक्सुअल करप्शन पर कहीं ज़्यादा ध्यान देना चाहिए।

जो लोग इस मामले में कॉम्प्रोमाइज़ करते हैं, वे भारत के दुश्मनों के ब्लैकमेल का शिकार बहुत आसानी से हो जाते हैं, उन लोगों के मुकाबले जो फाइनेंशियली करप्ट हैं!

जल्द ही सबूत दूंगी कि कैसे उन्हें पहले दिन से ब्लैकमेल किया जा रहा है।
इसलिए ये घटिया 56 इंचिया वाली शेखी!

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इस ट्वीट के बाद से उन्हें लगातार X पर ट्रोल किया जा रहा है, मगर वो सुपर एक्टिव रहकर ट्रॉलर्स का जवाब दे रही है और इस संबंध लगातार नए नए ट्वीट करती जा रही है... अब ये देखना रोचक होगा कि उनकी ये रस्साकस्सी या कहे कि शायद लाभ न मिलने के बाद का फ्रस्ट्रेशन कितने दिन चलता है और जैसा कि उन्होंने सुबूत देने की बात की है.. क्या क्या सुबूत देती है? वैसे संसद में महिला की संख्या गिनी चुनी ही है और उस पर ऐसे गंभीर आरोप से महिलाओं की राजनीति में स्थिति और खराब होगी... वैसे ही तरक्की करती महिलाओं के लिए ये बहुत आसानी से बोला ही जाता है कि " ये सो&&.. कर आगे बढ़ी है" 

#रीटा 
#मधुकिश्वर 
#महिलासंसद

https://x.com/i/status/2036844407929135426

Thursday, March 26, 2026

चिरैया वेब सीरीज

मैरिटल रेप पर बनी आज छह एपिसोड की वेब सीरीज चिरैया देखी तो बहुत सुकून मिला कि देर से सही समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके संघर्ष को लिखा जाने लगा है। एक तरफ मैरिटल रेप पर देश में कानून की कमी तो दूसरी ओर संघर्ष को बखूबी दिखाती वेब सीरीज का आखिरी एपिसोड तो वाकई दमदार है कि जब कोई स्त्री न्याय, इंसाफ और हक के लिए खड़ी होती है तो कैसे उसे अपने घर में ही गिराने का प्रयास पुरुष रूपी पिता, ससुर, भाई करते हैं और इसके लिए किसी भी हद तक पहुंच कर षडयंत्र रचते हैं, वहीं बड़ी बहु के पति और नानाजी को साथ देता दिखाकर "All men are not rapist", "सब पुरुष एक जैसे नहीं होते हैं" ये कहने वाले का मुंह भी बंद करने का प्रयास किया गया है।
 इसमें कहानी को बहुत ही महीन तार से बुना गया है और हर महिला अपनी आपबीती से इसे जोड़कर देख सकती हैं। एक स्त्री अपनी ही बेटी, बहु या किसी अन्य का साथ कई बार अप्रत्यक्ष रूप से देती है तो उसमें बगावत करने की हिम्मत नहीं होती, वहीं पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष कैसे अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए सही या गलत सब में खुलकर, छाती ठोक कर साथ देता है और अब चाहे वो घर में रेप का मामला क्यों न हो?
एक ससुर के रूप उस व्यक्ति को रचने की कोशिश की गई है जो सार्वजनिक मंच पर महिला उत्थान की बात करता है तो वही घर में हो रहे अपराध को मान मर्यादा की सीमा में दबने की कोशिश करता है।
दिव्या जब चुपके से परिवार पर हो रहे मुकदमा की जानकारी देकर Anticipayory Bail कराती है तो हमें एक ऐसी स्त्री दिखाई देती है तो अपने ऊपर परिवार की दुहाई देकर पितृसत्ता की रक्षा करते दिखाई देती है। और न्याय की राह में चलने वाली हर स्त्री को सही और गलत के रास्ते में उलझा कर कैसे पुरुष अपने को बचाने के लिए नीचता की हर सीमा पार करने की कोशिश करता है इसे बखूबी दिखाया गया है। वहीं एक रेप के मामले मे पूर्व यूपी मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का मंच से दिया गया चर्चित बयान भी इस्तेमाल किया गया है "लड़के है, लड़कों से गलतियां हो जाती हैं"।
साथ ही आखिरी में दादी का अचानक बोलकर अत्याचार को खिलाफ खड़े होना के लिए खुलकर बोलने की जो बात करना बहुत दमदार तरीके से दिखाया गया है क्योंकि हर स्त्री खुलकर, बाहर निकलकर,सामने आकर, खड़ी होकर, लिखकर साथ नहीं दे सकती तो सिर्फ अपने आसपास, घर परिवार में गलत पर चुप्पी तोड़कर स्त्री अपराध को कम करना में साथ दे सकती हैं।
लेखक चाहता तो आखिरी कुछ मिनटों में मारपीट कर, लड़कर इंसाफ दिलाते दिखा सकता था मगर उसने समाज की असल सच्चाई को दिखाने का प्रयास किया है कि जब एक औरत समाज के खिलाफ,एक पुरुष के खिलाफ खड़ी होती है तो उसे किन-किन असल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और कैसे उसे कमजोर और दबाने के सही, गलत प्रयास किए जाते हैं।
कुल मिलाकर सभी को और खासकर पुरूषों को इसे देखना चाहिए, आखिर तक देखकर मुझे इस वेब सीरीज के लेखक का नाम जानने की इच्छा हुई, गूगल किया तो पता चला कि दिव्य निधि शर्मा है, तभी शायद हीरोगिरी के बजाय स्त्री का असल संघर्ष पर पूरी सीरीज बन पाई।

P. S.. इसे कॉपी जरूर कर सकते हैं, मगर नाम/क्रेडिट देना न भूले..।

#रीटा 
#चिरैया 
#रिव्यू

Sunday, March 22, 2026

परंपरा के नाम पर चलता रहा खेल

परंपरा के नाम पर महिला शोषण, अत्याचार 

Forced Fattening (Leblouh)
दक्षिण पश्चिम अफ्रीका,  Mauritania में एक  परंपरा है Leblouh (लेब्लूह)। इसमे छोटी लड़कियों को जानबूझकर ज्यादा खासतौर से फैट वाला खाना खिलाया जाता है ताकि वो जल्दी बड़ी और भरे शरीर की दिखाई दे, इसे फोर्स फैटनिंग कहते हैं। वहां भरे शरीर की लड़कियों को सुंदर और समृद्ध परिवार की माना जाता है और इस कारण से उनकी जल्दी शादी भी हो जाती है।
इस परंपरा के कई नुकसान है, सबसे पहले तो महिला स्वतंत्रता का उल्लंघन और कई बीमारियों जैसे डायबिटीज, मोटापा और दिल से जुड़ी बीमारियां ज्यादा होती हैं। United Nations और अन्य NGOs इस प्रथा को child abuse मानते हैं। Mauritania की सरकार ने इस खत्म करने के लिए जागरूकता अभियान शुरू किए हैं, जिससे कुछ हद तक खास कर शहरी इलाकों में इसका चलन कम हो गया है।

अफ्रीका के कई हिस्सों जैसे कि 
कीनिया, युगांडा, नाइजीरिया, घाना में Widowhood Rituals (विधवा से जुड़े रीति-रिवाज़) प्रचलित है जैसे कि भारत में कभी सती प्रथा थी। यहां माना जाता है कि अगर किसी महिला का पति की मृत्यु हो गई है तो वो महिला अशुद्ध हो गई है और फिर उसे कई तरह के कठोर शुद्धिकरण परंपराओं से गुजरना पड़ता है। उन्हें पति के भाई या रिश्तेदार से शादी करने के लिए भी मजबूर किया जाता है। संपत्ति में उनका अधिकार नहीं दिया जाता है और कई परिवारों में महिलाओं को घर से बाहर निकाल भी दिया जाता है। एक तरह से महिला से उनके अधिकार और स्वतंत्रता छीनने की कोशिश की जाती है। हालांकि अब UN और कुछ लोकल NGO के प्रयास से स्थिति में सुधार हुआ है मगर फिर भी बड़े पैमाने पर शोषण जारी है।

महिला जननांग विकृति (FGM) (खतना)

अफ्रीका, मध्य-पूर्व, भारत, मलेशिया और यूरोप के प्रवासी समुदायों के कुछ हिस्सों में खासकर बोहरा समुदायों ये FGM या खतना प्रचलित हैं। दाऊदी बोहरा जो कि शिया समुदाय है, इसमें 6–7 साल की उम्र की लड़कियों के क्लिटोरिस (clitoris) का कुछ हिस्सा या पूरा हिस्सा काट दिया जाता है। वजह धार्मिक है.. उनका मानना है कि इससे लड़कियां पवित्र और शादी लायक हो जाती है। इस तरह शरीर के एक हिस्से के साथ छेड़छाड़ बिना किसी मेडिकल प्रशिक्षण के किया जाता है। इससे कई घातक परिणाम होते हैं.. शारीरिक पीड़ा के साथ बच्चियों के मन में डर बैठ जाता है और सेक्सुअल संबंधों, मासिक धर्म के दौरान उन्हें दर्द से गुजरना पड़ता हैं। इसे रोकने के लिए कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय संगठन सक्रिय है।
2017 में एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता Sunita Tiwari ने Supreme Court of India में एक याचिका (petition) दायर इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की, कई महिलाओं ने अपनी आप बीती, पीड़ा को सामने आकर साझा किया ।
ये एक तरह से महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन, शारीरिक और मानसिक पीड़ा पहुंचाने वाली क्रूर धार्मिक प्रथा है।

Neck Elongation या गर्दन को लंबा करना 
म्यांमार और उत्तरी थाईलैंड के कायन (कायन लाहवी) समुदाय में, लड़कियाँ लगभग पाँच साल की उम्र से ही अपनी गर्दन के चारों ओर पीतल के छल्ले पहनना शुरू कर देती हैं। समय के साथ इसमें और छल्ले जोड़े जाते हैं। ये छल्ले कॉलरबोन और पसलियों के पिंजरे को नीचे की ओर धकेलते हैं, जिससे गर्दन लंबी दिखाई देती है। यह प्रथा सुंदरता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। ऐसा माना जाता है कि लंबी गर्दन वाली सुंदर लड़की का विवाह संभ्रांत परिवार में होगा।
इससे होने वाले नुकसान की बात करें तो गर्दन और रीढ़ पर दबाव पड़ने से muscles कमजोर हो सकती हैं और अगर अचानक rings हटा दिए जाएँ तो 
दर्द और कमजोरी महसूस हो सकती हैं। हालांकि अब ऐसी प्रथाएं समय के साथ कम होती जा रही हैं।

ब्रेस्ट आयरनिंग Brest Iroining या छाती को विकसित होने से रोकना 

कैमरून, और नाइजीरिया, टोगो, गिनी और चाड के कुछ समुदायों में  'ब्रेस्ट आयरनिंग' (स्तनों को गर्म चीज़ों से दबाना) की प्रथा प्रचलित है। यहां एक छोटी लड़कियों के स्तन को बढ़ने से रोकने के लिए स्तनों को गर्म चीज़ों से दबाया या कूटा जाता है। इसका मकसद अक्सर यौवन की शुरुआत में देरी करना और यौन आकर्षण को कम करना होता है। यह प्रक्रिया अक्सर परिवार के सदस्यों द्वारा की जाती है; लगभग 58% मामलों में इसे माँ द्वारा अंजाम दिया जाता है।
जब ये प्रथा प्रचलित हुई थी तब उद्देश्य था कि बच्चियों को यौन हिंसा से बचाना, लड़कियां जितनी देर से विकसित होंगी उतनी ही सुरक्षित रहेंगी.. धीरे धीरे कबीले से लोग गांव, शहर में रहने लगे... महिलाओं की सुरक्षा के लिए नियम, कानून तो बनाए गए मगर संस्कृति के नाम पर ऐसी प्रथाएं चलती रही।
इसे चाइल्ड एब्यूज की श्रेणी में रखा गया है और रोकने के लिए तमाम सामाजिक संस्थाएं काम भी कर रही हैं।
लड़कियां तमाम तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याओं से गुजरती हैं। Breasts का असामान्य विकास, Cysts या lumps बनना, breastfeeding में दिक्कत और Skin Damage, Permanent Scars जैसी दिक्कतों के साथ मानसिक तकलीफ और एंजाइटी से रोज दो चार होती है।


Witch Hunting ( महिलाओं को डायन या चुड़ैल 
मानना)

ये भारत के झारखंड, ओडिशा, असम, बिहार और Papua, New Guinea,Africa के कुछ हिस्सों में ऐसे अंधविश्वास प्रचलित हैं। इसमें किसी महिला (कभी-कभी पुरुष भी) को “डायन” या जादू-टोना करने वाली बताकर उसे मारना पीटना, समाज से निकाल देना
जैसे अत्याचार किए जाते हैं। कई बार परिवार के लोग भी अकेली स्त्री या विधवा स्त्री देखकर संपत्ति के लालच से इस अंधविश्वास के पीछे षड्यंत्र रचकर महिला को मारपीट कर भगा देते है या जान से ही मार देते हैं। कई बार घर में किसी की मौत, बीमारी या फसल खराब होने जैसी समस्याओं पर भी किसी महिला पर आरोप मढ़कर उसे डायन बताकर मारपीट कर गांव से बाहर कर देते हैं। हालांकि झारखंड , असम सरकार ने Jharkhand Witchcraft Prevention Act, Assam Witch Hunting Prohibition Act
 कानून बनाकर रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए हैं।

Foot Binding (पैरों को बढ़ने से रोकना)
मुख्य रूप से China में लगभग 1000 साल तक (10वीं सदी से 20वीं सदी की शुरुआत ) ये परंपरा के नाम पर प्रचलित थी। इसमें 4–8 साल की लड़कियों के पैर मोड़ दिए जाते थे। उंगलियाँ (toes) अंदर की ओर दबा दी जाती थीं और फिर कपड़े से बहुत कसकर बांध दिया जाता था। ऐसा सालों तक बांधते रहते थे। 
इससे पैर का आकार 3–4 इंच तक छोटा हो जाता था। छोटा पैर सुंदरता का पर्याय माना जाता था , लड़कियां की शादी उच्च वर्ग में करने के लिए ऐसा किया जाता था। इससे बहुत ज्यादा दर्द होता था, कई 
हड्डियाँ टूट जाती थीं, चलने में दिक्कत (life-long disability) infection और कई बार सड़न (gangrene) पैदा हो जाती थी। बाद में चाइना सरकार ने इस पर बैन लगा दिए थे।

चाहे भारत देश हो या कोई अन्य, सभी जगह और धर्म में लड़कियों का सुंदर होना और विवाह होना ही उनकी जिंदगी का उद्देश्य था तो इस तरह के तमाम प्रयोग पुरुषों को खुश करने के लिए प्रयोग किए जाते थे और तमाम प्रयोग अब भी किए जाते हैं।


Writer Rita Sharma
Social Activist 

Wednesday, March 18, 2026

महिला दिवस पर विशेष

महिला दिवस पर लिखा था इसे नौ साल पहले 😌😌

महिला दिवस को जोर शोर से त्यौहार की तरह मनाया जाने लगा हैं, शॉपिंग स्टोर्स इस मौके पर डिस्काउंट की बौछार भी करते हैं.... खूब खरीदारी भी होती हैं...... गिफ्ट्स भी मिलते हैं... सुबह से ही शुभकामनाये देने वालों का व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर तातां लगा रहता है..... ये स्थिति शहरों की हैं.

लेकिन सोचनीय तथ्य है कि क्या सचमुच पूरा देश में महिला दिवस मनाया जा रहा है? गाँव और कस्बों की ओर एक नज़र डालने से हकीकत बयां हो जाती हैं, जहाँ छोटे छोटे निर्णय पर वो घर के पुरुषों की हाँ की मोहर लगानी जरुरी होती हैं भले ही वो उम्र में उनसे छोटा और अनुभव में कम हो, क्योंकि ये सामाजिक मान्यता है कि उनकी हाँ के बिना किया गया कार्य गलत होगा. कानून ने हमें बहुत आज़ादी, समानता और सुरक्षा के हथियार तो दिए हैं लेकिन हम खुद से ही अपने को इतना कमज़ोर और असुरक्षित समझते है की क़ानूनी हथियार भी कमज़ोर साबित होते हैं.

कहा जाता है की शिक्षा द्वारा हम आगे बढ़ सकते है और अपना विकास कर सकते है, पर कितनी ही जगह पर ये देखने को मिलता है कि शिक्षित महिला दकियासुनी बातें करती हैं और अपने ही तबके का पुरज़ोर विरोध करती नज़र आती हैं. माननीय राजनितिक पदों पर आसीन महिलाये भी कई बार " रात आठ बजे के बाद बाहर ना जाए" जैसे कई बयान देते नज़र आये हैं. जब हम खुद ही अपना विरोध करेंगे तो विकास की बाते भी बेईमानी साबित होगी. साथ ही स्त्री विकास और तरक्की या स्त्रीवाद ये बिलकुल भी नहीं कहता कि पुरुषों का विरोध किया जाए और उनकी सत्ता को नकार दिया जाए... स्त्री हर क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए कंधे से कंधे मिलाकर चले और उसे उसका यथोचित सम्मान और सत्कार मिले... यही स्त्रीवाद है और ये सब पाने के लिए उन्हें जरुरत पड़ने पर कानून का सहारा लेना चाहिए.

बढ़ते हुए महिला हिंसा और अत्याचार भी महिलाओं के बारे में चिंता व्यक्त करती है, ये बात तो कभी कभी सोच समझ से परे होती है कि महानगरों की बेहद शिक्षित युवती क्यों और किसलिए मानसिक और शारीरिक अत्याचार सहती है, उन्हें तो सभी कानून की जानकारी हैं और शिक्षा जैसा हथियार भी. अक्सर हम ये कहते नज़र आते हैं कि शिक्षा एक हथियार है..... स्त्री अत्याचार और अपराध खत्म करने का... लेकिन क्या ये सही मायने में सत्य प्रतीत होता है?

हम सही संदर्भों में तब ही महिला दिवस और सशक्तिकरण की बात कर पाएंगे जब इन सब की जानकारी या बातें हम अपने परवरिश में शामिल करें... जहाँ बिना भेदभाव के अच्छा और बुरा, सही और गलत की जानकारी अपने बेटे और बेटियों को दे. बेटों को भी स्त्री सम्मान और भावनाओं की क़द्र करना सिखाए।

एक ओर सही परवरिश से ही हम स्त्री के प्रति हो रही हिंसा और अपराध को कम कर सकते है, वही लड़कियों को अपने हक, सम्मान, न्याय की बात बेबाकी से कहना सिखाये... उन्हें बहादुर और सशक्त बनाये और जरुरत पड़ने पर कानून की मांग करे.

सुन ले तो अपने अंतर्मन की पुकार, चल उठ और उठा न्याय, हक का हथियार, चार कदम चलने का हौसला जुटा, पंख खुद ब खुद लग जायेंगे तेरे, खुली आसमा में उन्मुक्त उड़ान के लिए."

#रीटा 
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