Wednesday, March 18, 2026

महिला दिवस पर विशेष

महिला दिवस पर लिखा था इसे नौ साल पहले 😌😌

महिला दिवस को जोर शोर से त्यौहार की तरह मनाया जाने लगा हैं, शॉपिंग स्टोर्स इस मौके पर डिस्काउंट की बौछार भी करते हैं.... खूब खरीदारी भी होती हैं...... गिफ्ट्स भी मिलते हैं... सुबह से ही शुभकामनाये देने वालों का व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर तातां लगा रहता है..... ये स्थिति शहरों की हैं.

लेकिन सोचनीय तथ्य है कि क्या सचमुच पूरा देश में महिला दिवस मनाया जा रहा है? गाँव और कस्बों की ओर एक नज़र डालने से हकीकत बयां हो जाती हैं, जहाँ छोटे छोटे निर्णय पर वो घर के पुरुषों की हाँ की मोहर लगानी जरुरी होती हैं भले ही वो उम्र में उनसे छोटा और अनुभव में कम हो, क्योंकि ये सामाजिक मान्यता है कि उनकी हाँ के बिना किया गया कार्य गलत होगा. कानून ने हमें बहुत आज़ादी, समानता और सुरक्षा के हथियार तो दिए हैं लेकिन हम खुद से ही अपने को इतना कमज़ोर और असुरक्षित समझते है की क़ानूनी हथियार भी कमज़ोर साबित होते हैं.

कहा जाता है की शिक्षा द्वारा हम आगे बढ़ सकते है और अपना विकास कर सकते है, पर कितनी ही जगह पर ये देखने को मिलता है कि शिक्षित महिला दकियासुनी बातें करती हैं और अपने ही तबके का पुरज़ोर विरोध करती नज़र आती हैं. माननीय राजनितिक पदों पर आसीन महिलाये भी कई बार " रात आठ बजे के बाद बाहर ना जाए" जैसे कई बयान देते नज़र आये हैं. जब हम खुद ही अपना विरोध करेंगे तो विकास की बाते भी बेईमानी साबित होगी. साथ ही स्त्री विकास और तरक्की या स्त्रीवाद ये बिलकुल भी नहीं कहता कि पुरुषों का विरोध किया जाए और उनकी सत्ता को नकार दिया जाए... स्त्री हर क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए कंधे से कंधे मिलाकर चले और उसे उसका यथोचित सम्मान और सत्कार मिले... यही स्त्रीवाद है और ये सब पाने के लिए उन्हें जरुरत पड़ने पर कानून का सहारा लेना चाहिए.

बढ़ते हुए महिला हिंसा और अत्याचार भी महिलाओं के बारे में चिंता व्यक्त करती है, ये बात तो कभी कभी सोच समझ से परे होती है कि महानगरों की बेहद शिक्षित युवती क्यों और किसलिए मानसिक और शारीरिक अत्याचार सहती है, उन्हें तो सभी कानून की जानकारी हैं और शिक्षा जैसा हथियार भी. अक्सर हम ये कहते नज़र आते हैं कि शिक्षा एक हथियार है..... स्त्री अत्याचार और अपराध खत्म करने का... लेकिन क्या ये सही मायने में सत्य प्रतीत होता है?

हम सही संदर्भों में तब ही महिला दिवस और सशक्तिकरण की बात कर पाएंगे जब इन सब की जानकारी या बातें हम अपने परवरिश में शामिल करें... जहाँ बिना भेदभाव के अच्छा और बुरा, सही और गलत की जानकारी अपने बेटे और बेटियों को दे. बेटों को भी स्त्री सम्मान और भावनाओं की क़द्र करना सिखाए।

एक ओर सही परवरिश से ही हम स्त्री के प्रति हो रही हिंसा और अपराध को कम कर सकते है, वही लड़कियों को अपने हक, सम्मान, न्याय की बात बेबाकी से कहना सिखाये... उन्हें बहादुर और सशक्त बनाये और जरुरत पड़ने पर कानून की मांग करे.

सुन ले तो अपने अंतर्मन की पुकार, चल उठ और उठा न्याय, हक का हथियार, चार कदम चलने का हौसला जुटा, पंख खुद ब खुद लग जायेंगे तेरे, खुली आसमा में उन्मुक्त उड़ान के लिए."

#रीटा 
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