Friday, October 16, 2020

Rape घटना है या बिछाया हुआ जाल


1️⃣ - क्या अब भी आपको यही लगता है कि , बलात्कार मात्र छोटे कपड़े , वासना , बदले की भावना से होते हैं ?

2️⃣ - क्या अब भी आपको यही लगता है कि एक महिला का बलात्कार मात्र उसकी आबरू का विषय है ? उसके आसपास कोई काॅबवेब नहीं है?

1️⃣ -  क्या अब भी आपको यही लगता है कि , बलात्कार मात्र छोटे कपड़े , वासना , बदले की भावना से होते हैं ?

जवाब.... 1- सारे कारण है अलग अलग स्थिति में.. उदाहरण से समझते हैं दिल्ली की निर्भया का Rape वासना के साथ मानसिक विकृति थी, हाथरस की वज़ह दुश्मन दिख रही है, लोग कहते हैं कि छोटे कपड़े लेकिन छोटी कपड़े वालियाँ बहुत तेज होती और उन्हें छुना भी किसी के बस की बात नहीं है.. दिल्ली के माल, क्लब, जाती लड़कियां और फिल्म Actress छोटे कपड़े में विभिन्न मौके पर दिख जाएंगी लेकिन यही Actress जब ED के दफ्तर पूछताछ के लिए बुलायी गयी तो सूट में थी. तो ऐसे लोगों की फोटो देखकर आंख सेक कर दिमाग में नोचने के तरीके रखकर किसी लड़की का Rape किया जाता है. छोटे कपड़े से कहीं ज्यादा उत्तेजक चीजे वीडियो YouTube पर और अब Facebook के वीडियो Section में मिल जाएंगी.. जब Facebook के नयी सेटिंग तब अपने आप खुल जाती है जब आप अपनी या किसी और की वॉल पर जानकारी भरी वीडियो देख रहे होते. जैसे ही आपकी वीडियो खत्म होगी तो दूसरी नग्नता भरी वीडियो खुद ही स्टार्ट हो जाएगी. ऐसा एक बार मेरे साथ भी हुआ तो जो दूसरी वीडियो आयी थी उसमें दिखाया गया कि एक Plumber जब बुलाने पर घर जाता है तो पहले बेटी और फिर उसकी माँ बारी बारी से अलग अलग कमरे में ले जाकर सेक्स करती है और ऐसा करते हुए उनकी बहु देख लेती है तो फिर अगले दिन अपने bathroom को ठीक करने के बहाने वो भी बुला कर sex करने की planning करती है.. ये वही Facebook है जो कि आपराधिक और दर्द भरी वीडियो, फोटो को हिंसक दिखाकर पॉलिसी के तहत कवर करता है... तो फिर Rape करने के बहाने न खोज कर अपने गंदे दिमाग का इलाज कराना सीखे 

2️⃣ - क्या अब भी आपको यही लगता है कि एक महिला का बलात्कार मात्र उसकी आबरू का विषय है ? उसके आसपास कोई काॅबवेब नहीं है?

जवाब.... 2-.. ये सही है ये Rape में इज्जत का concept पुरुष समाज द्वारा फैलाया गया जाल ही है ऐसा हमेशा बताया गया है कि एक लड़की और उसके पूरे परिवार, खासकर बड़े भाइयों की इज्जत केवल लड़की की योनि में ही है और वो योनि केवल पति के हाथ में हो तो इज्जत बनी रहती है.

 ऐसा पुरुषों ने ही बनाया है लेकिन ये जिम्मा लड़की के हाथो में दिया गया है वो कैसे भी करें पर्दा करें, नकाब पहने, साड़ी लपेटे, सूट पहन ले खुद को घर में कैद रखे, आफिस में एकदम मुँह बनाकर रहे, किसी लड़के से हंसे बोले नहीं, लड़कों को दोस्त न बनाए, उनके साथ मूवी न देखे, रात को न जाए, लड़के से प्यार न करें.. इनमे से कुछ भी माहौल के हिसाब से पालन करके अपनी योनि सुरक्षित रखे क्यू कि बाप, भाई की इज्जत वही है.. लेकिन लड़कों को पूरा अधिकार है उन पर हमला कर Rape करने का.. लड़के का Rape करना, दस बीस लड़कियों के साथ Sex करना, दस बीस ल़डकियों को Girl फ्रेंड बना कर sex करना उनके दोस्तों के बीच गर्व का विषय होता है.. ये जाल ही बिछाया गया है मर्दों द्वारा.. क्यू कि अगर Sexual Part के साथ इज्जत जुड़ी होती तो लड़के का पेनिस भी इज्जत का विषय होना चाहिए था और अगर ये नियम बना दिया जाता तो लड़के अपने Sexual Part संभालते और लड़की अपना.. फिर Rape तो दूर असुरक्षित सेक्स, शादी से पहले सेक्स, शादी से पहले Pregnengy जैसी कोई भी समस्या होती ही नहीं और मार्केट में Unwanted Pill नहीं लाया जाता...
इससे इतना तो साफ हो गया कि ये सब पुरुषों द्वारा षडयंत्र स्वरुप रामायण, महाभारत काल से पहले ही ये सब गढ़ दिया गया था अलग अलग तरह के ग्रंथो, रचनाओं के माध्यम से सभी धर्मों में (केवल हिन्दू धर्म न समझे) धर्म के जानकार मेरी बात के हिसाब से बताये कि किस किताब में कहाँ कहाँ ऐसा वर्णन है और ध्यान दीजियेगा कि इसमे रचनाकार पुरुष ही होगा जो उस समय उस समाज उस धर्म में खूब पुज्य भी होगा.
लेकिन ऊपर लिखी गई बातों का ये मतलब नहीं है कि लड़की के इर्द-गिर्द Rape के साथ इज्जत न जोड़ा जाए तो उसे ज़बरदस्ती सेक्स, Rape पर तकलीफ नहीं होगी.. होगी और साथ ही इज्जत जाने की फिलिंग भी आएगी क्यू कि हम हमारे शरीर के मालिक होते हैं और हमारी मर्जी के खिलाफ कोई उसे छुए भी तो लंबे समय तक दर्द सताता है.. साथ ही आपके मन पर कोई चोट पहुचा दे तो लगता है कि हमारा मान सम्मान पर आंच आयी.. ये केवल लड़की के साथ नहीं है, पुरुष के साथ और यहां तक कि माननीय कोर्ट के साथ भी ऐसा एहसास जुड़ा हुआ है. सब को याद होगा कि सीनियर Advocate प्रशांत भूषण के ट्वीट भर से कोर्ट की प्रतिष्ठा को आंच पहुंचीं थी.. लड़कियों के साथ भी वही वाली इज्जत जुड़ी हुई है.. कोई उसकी योनि न भी छुएं , Rape न भी करें  तब भी उसकी इज्जत जा सकती है..इज्जत तो लड़कों की भी जा सकती है मगर उनका माइंड सेट ऐसा बनाया नहीं गया.. उनके साथ अगर लड़की ज़बर्दस्ती सेक्स कर भी ले तो उन्हें शिकायत नहीं होगी (अपवाद छोड़कर) क्यू कि न तो उनका प्राइवेट पार्ट उनकी इज्जत है और दूसरा उनका माइंड सेट ये भी है कि सेक्स केवल मजे की चीज़ है जितना मिले, जिससे मिले सब लेते जाओ.. इन पुरुषों का माइंड सेट इतना हाई लेवल का है कि ये कहते हैं कि "मर्द कभी बुढ़ा नहीं होता" और जब कोई ये कहे तो जरा उनके Facial Expression रीड करिये.. उतरते चढ़ते भाव बता रहे होंगे कि बोलते वक्त सेक्स की कल्पना कर चुके है.. जो जरूर किसी वीडियो या Movie के सीन जैसा होगा. 50-60 साल में खुद को 16 साल सा गबरू जवान मानकर अपनी बेटी बराबर लड़कियों को Girl Friend बनने का ऑफर देते हैं, सेक्स के ख्वाब सजोते है... इसके दो कारण उनके पास होते हैं एक तो खुद को जवान मान रहे हैं, दूसरा इज्जत आने जाने का ठेका उनके पास है नहीं.. और अगर ऐसी बाते खुलती हैं तो वो खुद और पूरा मर्दों का समाज लड़की को रंडी, बदचलन बोलेगा,उक्त पुरुष पर सवाल नहीं उठेगा. 

इतनी सारे जाल बिछाये जाने के बावजूद कानून ने लड़कियों की सुनी है और समाज के ये सारे षडयंत्र समझते हुए लड़की के हक में कानून बना दिए हैं... निर्भया केस के बाद बनी वर्मा कमेटी के सुझावों पर अमल करते हुए IPC में बदलाव करके उसी बहादुर बेटी को समर्पित करते हुए कानून बनाया गया है कि 20 Sec देखने भर को छेड़छाड़ और सेक्स की कोशिश में कोई Object Vagina को डालने भर को Rape मानकर Case दर्ज होगा..Rape तो काफी दूर की चीज़ हो गयी.. कानून के मजबूती का एहसास यूपी के हाथरस घटना से कर सकते हैं.. रिपोर्ट बदलने की कोशिश की गई, देर में मेडिकल कराया, ADG L & O खूब चिल्लाएं पागलों की तरह कि Rape नहीं हुआ है,लिखने वालों पर कार्रवाई करने की धमकी दी, खूब पुलिस के साथ गुंडों ने धमकी दी, बेटी का दाह संस्कार रात को आनन फानन में कर दिया कि दोबारा पोस्टमार्टम न हो...

फिर भी....

फिर भी...

ADG L & O से कोर्ट में पूछा गया कि आपको कैसे पता है कि Rape नहीं हुआ.. क्यू कि लड़की की मेडिकल रिपोर्ट में Veginal एंजरी लिखी है और लड़की का बयान के आधार पर Rape / Gang Rape मानकर ही सुनवाई होगी..
अब हाथरस केस में Rape की सुनवाई में खुद CM, PM भी नहीं रोक सकते हैं.. देखिए जरा कि एक बेटी की मृत आत्मा में कितनी शक्ति है कि इतने बड़े बड़े पिशाच पूरा सिस्टम खुद की तरफ करके भी कुछ न कर पाए..

बस यही जाल जो बुना हुआ है उसे तोड़ना है हमे.. बात करनी है इस पर.. बेटियों सहित बेटों से भी खुलकर चर्चा करनी है.. उन्हें साफ साफ बता देना है कि कुछ भी करने पर कानूनन सजा मिलेगी कोई भी नहीं बचा सकता है फिर.. ये तो कहानी उस बेटी की शक्ति की जो चली गई लेकिन जिंदा रही बेटियों को भी उनकी शक्ति का एहसास कराए.. उन्हें आत्मविश्वास दे, बोलना सिखाए

सवाल - Aryavrat Tripathi 
जवाब -  रीटाशर्मा

Tuesday, October 13, 2020

पहचान ढूंढती स्त्री

स्त्रियों को कहीं चैन नहीं मिलता है. कभी मर्डर, कभी Rape, कभी खुद ही जलकर मरने की कोशिश करती हैं. पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की जगह बनाई ही नहीं गयी. पुरुषों ने अपने सुविधा के अनुसार नियम बनाकर महिलाओं को मर्यादा जैसे शब्द में बांध दिया. स्त्रियों के लिए सभ्य, सुशील, संस्कारी जैसे शब्द गढ़ दिए गए और पुरुषों के आगे सलाम ठोकने वाली महिलाओं को ये उपाधियां दी जाने लगी. आदेश का पालन करते करते स्त्रियां इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि जो इन नियमों से बाहर जाने की कोशिश करता है उन्हें घर की स्त्रियां बदचलन बना देती है. बदचलन भी केवल स्त्रियां ही होती है. कई कई शादी करके, पांच दस अफेयर रखकर भी ये आदमी नाम की जाति Cool Dude कहलाती है. चाहे आज प्रजातंत्र की बात की जाए, चाहे धार्मिक युग की.. छली गई सीता, द्रौपदी भी थी और छली जा रही है आज की स्त्री भी. कोई अन्तर नहीं आया इतने लंबे समय में भी. एक और ग़ज़ब की बात है कि सीता को बचाया राम ने था और द्रौपदी को कृष्ण ने.. ये भी पुरुषों की ही साजिश रही है कि स्त्री कोमल, नाजुक, असमर्थ हैं तो उसे बचाने के लिए पुरुषों की ही गुहार लगानी है. वही माइंड सेट आज भी है कि एक स्त्री अपने हक, सुविधा, अधिकार, सुरक्षा के लिए हमेशा पुरुष की ओर ही देखती है.. घर से बाहर निकल कर कमाने की बात इसलिए की गई थी कि स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर अपने हक की आवाज बुलंद करेगी. मगर स्त्री खुद मानसिकता को बदल ही न पायी वो अपने Workplace पर भी असुरक्षित बनी हुई है और चाहती है कि सुरक्षा उसे ऑफिस के पुरुष ही प्रदान करें. ऐसी गुलामी की मानसिकता जब तक खत्म नहीं होगी तब तक स्त्री अपराध, शोषण, हिंसा कम नहीं होगा. जिस तरह से जब कोई पुरुष तकलीफ में होता है तो वो अपने ही पुरुष मित्र से मदद मांग कर अपनी तकलीफ कम करता है तो वैसे एक स्त्री दूसरी स्त्री की मदद क्यू नहीं कर पाती है उसे परेशानी खत्म करने में. ये सब मंथन का विषय है और जब तक स्त्री इस पर खुद नहीं विचार नहीं करेगी.. पुरुष सत्ता की सोच से बाहर नहीं आयेंगी.. कोई भी नियम, कानून, कड़ी से कड़ी सजा भी अपराध/प्रताड़ना को नहीं रोक पाएगा.

आज लखनऊ में बीजेपी आफिस के सामने एक स्त्री ने खुद को आग के हवाले किया, उसे कुछ न कुछ गंभीर परेशानी रही होगी और इस सभ्य समाज में उसे घर से लेकर बाहर तक कोई सुनने, समझने वाला नहीं मिला.

Saturday, October 10, 2020

मानसिक स्वास्थ्यता जरूरी है



WHO के एक अनुमान के अनुसार, 2020 तक भारत की लगभग 20% आबादी किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त होगी.
मानसिक बीमारी शारीरिक बीमारियों की तरह दिखाई नहीं देती है तो लोग न तो इसके बारें में जानते हैं न ही इलाज कराते हैं. किसी भी तरह के व्यवहार में परिवर्तन पर कोई ध्यान नहीं देता और मनोवैज्ञानिक के पास जाने से भी कतराते है. इसकी वज़ह समाज में फैला एक मिथ ये भी है कि हमें कोई मनोचिकित्सक के पास जाता दिखता है तो हम उसे पागल समझते हैं.
किसी भी तरह की उलझन, परेशानी, तनाव, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन हमारे व्यक्तित्व विकास में भी बाधक बनता है. आज कल की दौड़भाग भरी जिंदगी में अकेलापन भी मानसिक अस्वस्थ्यता एक बडा कारण है. पढ़ाई, नौकरी या कुछ बड़ा करने की चाहत में हम घर से बाहर जाते हैं और रोज रोज की भागमभाग में खुद पर ध्यान देना ही भूल जाते हैं. 
अगर समय से हम मनोचिकित्सक, सलाहकार के पास जाए तो ऐसी समस्याओं से निजात पा सकते हैं
भारत में युवा आबादी का एक बड़ा वर्ग ऐसी छोटी छोटी मानसिक समस्याओं से जूझता है. कभी कैरियर, कभी कोई पारिवारिक समस्या और कभी ब्रेकअप हो जाने पर मानसिक समस्याओं के चपेट में आ जाती है. घरेलु महिलाए जो ज्यादा सामाजिक नहीं है, घर के बुजुर्ग भी मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाते हैं
हम क्या खा रहे हैं इससे हमारा शारीरिक स्वास्थ्य निर्धारित होता है और क्या सोच रहे हैं? किन किन विचारों के बीच हमारा रहना होता है? इससे मानसिक स्वास्थ्य तय होता है. अच्छे सकारात्मक विचार वालों के बीच रहने से हमारा मानसिक स्वास्थ्य अच्छा हो सकता है. इसके साथ ही कई बार अचानक घटित हुई कोई घटना पर ज्यादा सोच विचार विचार करने लगते हैं इससे भी तनाव, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, उलझन होने लगती है और अगर बहुत समय ऐसा चलने लगे तो डिप्रेशन में आने लगते हैं.
 मानसिक समस्याएं अदृश्य किन्तु घातक होती है, ये व्यवहार में परिवर्तन लाने के साथ साथ कई बार उग्र भी बना देती है.. इससे निपटने के लिए हमें जागरूक होने की जरूरत है और जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक /काउंसलर की भी मदद लेने के लिए तैयार रहना चाहिए..
आइए आज अन्तर्राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर स्वस्थ्य रहने के लिए कुछ जरूरी बातों पर गौर करते हैं... 


अच्छा सुने और अच्छा सोचे, सकारात्मक रहे..

अगर कुछ ऐसा घटित हो रहा है कि आप परेशान, बैचैन रहते हैं तो इसकी वज़ह ढूंढ कर उसे खत्म करें. जरूरत पड़ने पर परिवार, दोस्तों या मनोचिकित्सक की मदद ले.

 अच्छा और घर का पका हुआ खाना खाए. कहते भी हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है. मौसमी सब्जी, फल खाने में शामिल करें. जंक फूड का सेवन एक तय सीमा में ही करें.

पर्याप्त नीद ले कम से कम 6 घंटे. जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत डाले. 

मन को शांत रखने के लिए योग, ध्यान और व्यायाम करें. कुछ समय खुली हवा में प्रकृति के बीच रहे.

दिमागी खुराक के लिए कुछ गेम खेले या किताब पढ़े. कुछ समय अपने शौक को पूरा करने में भी दे.

उठो बेटियाँ

#यूपी
#महिलाअपराध
#रेपमर्डर 

आज राम भी शर्माता होगा
देख देख ये धरती का हाल
जहां स्त्री के सम्मान के लिए
उन्होंने सारी लंका जला दी
वही उनके नाम लेकर 
रावणों की एक लंका बस गयी
एक अपराधी को बचाने के लिए
सारी राम रूपी लंका एक हो गयी
दे दनादन लाठी डंडा, धक्का मुक्की
और चिल्लाना खेले उन्होंने सारे पैंतरे
हर रोज सीताओं की आवाज दबायी
दिन दहाड़े हैवानों ने बेटियों को नोच डाला
कभी जाति धर्म का दांव खेलकर
न्याय की सीमा परिभाषित की 
बेटियों का भी बटवारा दिया
लंका में रावण की बंदी सीता ने भी
 हनुमान से वार्ता की थी
लेकिन राम रूपी रावण राज्य में
शोषित बेटियों की परीक्षा होगी
अपराधी तो अट्टहास करेगा
बेटियों से सुबूत मांगेगा
.......................
फिर क्या कोई राम आएगा?
रावण को जो सबक सिखाएगा?
है बेटियाँ यही पूछती....
इस पर सीता द्रवित हो गयी..
बेटियों से फिर वो बोली..
सुनो बेटियों तुम खुद खड़ी हो
अब किसी की राह न तो..
पापियों से न डरों तुम
है तुम भी असीम शक्ति
बस उसका एहसास करो अब
कर दो उन लोगों का नाश
जिन्होंने स्त्रीत्व को संकट में डाला
बदलों अब स्त्रीत्व की परिभाषा को
जिसने गरिमा को संकट में डाला
कर दो उसका समूचा नाश ll

रीटा शर्मा

Friday, October 9, 2020

बदलाव


हमेशा से ही भारतीय समाज में कोई न कोई सामाजिक समस्या/बुराई /अंधविश्वास /सामाजिक कुरीतियां/अपराध रहा है और उसे खत्म करने के लिए उसी समाज के लोगों ने प्रयास किए है. वही स्थिति अब भी है, केवल एक दूसरे को कोसने से और ये कहने से कि ज़माना बहुत खराब है.. कुछ बदलाव नहीं होने वाला.
समाज में जो कुरीतियां विभिन्न धर्म/जातियों में प्रचलित है उसे खत्म करने के हमे प्रयास करने होंगे. युवा वर्ग को ही इसके लिए खड़ा होना होगा. ऐसी समस्याएं भी दो स्तर पर खत्म की जा सकती है एक तो सामाजिक पहल जिसके लिए विमर्श, जागरुकता फैलायी जाए और दूसरा कानूनी स्तर पर.. जब कोई हमें/आपको जबरन कुछ करने के लिए बाध्य कर रहा हो तो कानूनी सहायता ली जाए.
दोनों ही तरीकों पर जब तक पूरी तरह से अमल नहीं किया जाएगा बदलाव नहीं होने वाला. बदलाव करने के लिए कोई क्रांति नहीं करनी है, कोई प्रदर्शन नहीं करना है. बस प्रतिदिन अपने आसपास हो रही सभी अच्छे - बुरी चीजों पर नजर रखनी है और कुछ अनुचित दिखने पर टोक देना है.. अगर कोई नुकसान पहुंचाने वाला अपराध, कृत्य नहीं है तो बस टोकना ही पर्याप्त है. बस इसके लिए केवल आपको संवेदनशील होना है और "हमसे क्या मतलब है? " वाले एटीट्यूड को छोड़कर "हमे अपने समाज को बेहतर बनाना है" वाली सोच रखनी है. जब आपकी सोच बेहतरी के लिए बदलाव पर होगी तो बहुत आसान होगा कि आप किसी को अनुचित देखकर टोके.
जब हम किसी को ये बताते हैं कि जो ये आप कर रहे हैं वो गलत है तो पहला रिएक्शन हमें बुरा ही मिलेगा.. लेकिन बार बार कहने पर सामने वाले पर असर पड़ेगा और यही से बदलाव होने लगेगा.. मसलन आपने किसी एक को बोला और उसने समझ लिया तो वो दस और लोगों को बोलेगा.. इस तरह बदलाव की कड़ी जुड़ती जाएगी. 😃



इसे उदाहरण से समझ सकते हैं.. आप रोज शाम को वाॅक करने जा रहे हैं और आपको रास्ते में या पार्क में 15-17 साल के लड़कों का एक ग्रुप दिखता है जो केवल लड़कियों पर कमेन्ट करने के इरादे से खड़े होते हैं.. आपने उन्हें टोका तो शायद उन्हें बहुत बुरा लगेगा.. हो सकता है कि कुछ बहस भी करें.. ये नए जवान होते बच्चे है इन्हें तो अच्छे - बुरे की भी समझ नहीं होती है मगर आपको पता है कि अगर ऐसे ही इन्हें छूट मिलती रही तो आगे चलकर कुछ बड़ा अपराध भी कर सकते हैं तो अभी उन्हें रोकना उनके ही हित में है.. उन्हें टोकने से पहले आप अपने साथ दो चार और लोगों को ले ले तो बेहतर रहेगा.. कई बार बोलने पर ये बच्चे खुद ही ऐसी हरकते बंद कर देंगे और जैसे ही इनके दिमाग में ये आएगा कि ये कमेन्ट पास करना आपराधिक कृत्य है इस पर लगाम लगने लगेगा. ऐसे बातेँ होने की एक बहुत बड़ी वज़ह है कि हम बच्चों से अच्छे - बुरे चीजों पर बात नहीं करते. केवल महंगे स्कूल, कॉलेज में प्रवेश दिला देने से उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होगा.

दूसरा उदाहरण भी ले सकते हैं कि आपकी कॉलोनी, मोहल्ले में कुछ लोग सड़क पर कूड़ा डाल देते हैं, अपनी छत से फेक देते हैं.. आप देखते ही इन्हें मना करें. शुरू में एक दो दिन बुरा लगेगा फिर ऐसा करना बंद कर देंगे और आपका एरिया साफ, सुथरा, बीमारी मुक्त होगा.