आज लखनऊ में बीजेपी आफिस के सामने एक स्त्री ने खुद को आग के हवाले किया, उसे कुछ न कुछ गंभीर परेशानी रही होगी और इस सभ्य समाज में उसे घर से लेकर बाहर तक कोई सुनने, समझने वाला नहीं मिला.
Tuesday, October 13, 2020
पहचान ढूंढती स्त्री
स्त्रियों को कहीं चैन नहीं मिलता है. कभी मर्डर, कभी Rape, कभी खुद ही जलकर मरने की कोशिश करती हैं. पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की जगह बनाई ही नहीं गयी. पुरुषों ने अपने सुविधा के अनुसार नियम बनाकर महिलाओं को मर्यादा जैसे शब्द में बांध दिया. स्त्रियों के लिए सभ्य, सुशील, संस्कारी जैसे शब्द गढ़ दिए गए और पुरुषों के आगे सलाम ठोकने वाली महिलाओं को ये उपाधियां दी जाने लगी. आदेश का पालन करते करते स्त्रियां इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि जो इन नियमों से बाहर जाने की कोशिश करता है उन्हें घर की स्त्रियां बदचलन बना देती है. बदचलन भी केवल स्त्रियां ही होती है. कई कई शादी करके, पांच दस अफेयर रखकर भी ये आदमी नाम की जाति Cool Dude कहलाती है. चाहे आज प्रजातंत्र की बात की जाए, चाहे धार्मिक युग की.. छली गई सीता, द्रौपदी भी थी और छली जा रही है आज की स्त्री भी. कोई अन्तर नहीं आया इतने लंबे समय में भी. एक और ग़ज़ब की बात है कि सीता को बचाया राम ने था और द्रौपदी को कृष्ण ने.. ये भी पुरुषों की ही साजिश रही है कि स्त्री कोमल, नाजुक, असमर्थ हैं तो उसे बचाने के लिए पुरुषों की ही गुहार लगानी है. वही माइंड सेट आज भी है कि एक स्त्री अपने हक, सुविधा, अधिकार, सुरक्षा के लिए हमेशा पुरुष की ओर ही देखती है.. घर से बाहर निकल कर कमाने की बात इसलिए की गई थी कि स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर अपने हक की आवाज बुलंद करेगी. मगर स्त्री खुद मानसिकता को बदल ही न पायी वो अपने Workplace पर भी असुरक्षित बनी हुई है और चाहती है कि सुरक्षा उसे ऑफिस के पुरुष ही प्रदान करें. ऐसी गुलामी की मानसिकता जब तक खत्म नहीं होगी तब तक स्त्री अपराध, शोषण, हिंसा कम नहीं होगा. जिस तरह से जब कोई पुरुष तकलीफ में होता है तो वो अपने ही पुरुष मित्र से मदद मांग कर अपनी तकलीफ कम करता है तो वैसे एक स्त्री दूसरी स्त्री की मदद क्यू नहीं कर पाती है उसे परेशानी खत्म करने में. ये सब मंथन का विषय है और जब तक स्त्री इस पर खुद नहीं विचार नहीं करेगी.. पुरुष सत्ता की सोच से बाहर नहीं आयेंगी.. कोई भी नियम, कानून, कड़ी से कड़ी सजा भी अपराध/प्रताड़ना को नहीं रोक पाएगा.
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