जब स्त्रीत्व रूपी भावना भरा मन खुद पर हावी होता है,
तो मन करता है कि जोड़ लूं उसके आगे हाथ,
छोड़ दूँ सच की लड़ाई,
दे दूं आजादी उसे घर और होटलों में लड़कियां लाने की, हर दो महीने में किसी नए शरीर से खेलने की,
यही तो कहा था उसने कि बंधन में नहीं रह पाएगा,
अगर बाहर किसी लड़की के साथ देखो तो शक मत करना, सवाल मत करना, दोस्तों के साथ दारू तो चलेगी ही,
मग़र ये तब कहा जब उसने मुझे हासिल कर लिया,
उससे पहले तो वो आदर्श व्यक्ति था और मेरी हर बात में उसकी हाँ थी
जी करता है मान लूं अपनी हार, जो हर स्त्री के हिस्से में लिखी होती है
करू उसकी खूब तारीफ इस दुनिया में, दोस्तों
दुनिया को बताऊँ कि ऐसा ही होता है आदर्श पुरुष
जो कि हर स्त्री का काम होता है
बस पहन ओढ़ कर, खा पीकर परिवार चलाना होता है
उसे नहीं होता है हक सवाल पूछने का, गलत पर खड़े होने का
यही तो चली आ रही है परंपरा महिलाओं के लिए
मेरी माँ बहुत सी जगहों पर चुप रहती थी हमारे खातिर
लेकिन वो मुझसे नहीं कहती हैं चुप रहने को
वो साथ तो नहीं देती मग़र मुझे खामोश होने की कोई हिदायत भी नहीं देती
उसे लगता है कि उसकी ये बेटी बहुत मजबूत है, हर परिस्थिति में लड़ने की
उसे कभी कभी तो उसे लगता है कि मेरा स्वभाव ही है संघर्ष का
मग़र नहीं, मैं अंदर से बहुत कमजोर हूं किसी भी स्त्री से भी ज्यादा
अब मैं नहीं लड़ना चाहती किसी भी परिस्थिति में
बार बार मन कहता है कि काश कुछ ऐसा हो जाए कि पुराना वो वक्त वापस आए जब मैं खुश थी नयी जिंदगी की शुरुआत से ...
नयी जिंदगी की शुरुआत की सोच ही मेरी गलती थी नयी,
जिंदगी किसी भी पुरुष या उसके ही साथ वैसी ही होगी., लड़की, शराब, दारू, उसके दोस्तों के बीच चुप रहकर, उसके परिवार का खयाल, आदर्श बहु बनने की कवायद..
मैने अब जाना है कि चुप रहना ही एक स्त्री के सुखी विवाहित जीवन का आधार होता है,
बोलती हुई बुद्धिमान लड़कियां कभी भी घर नहीं बसा सकती मेरी तरह..
न जाने क्यू मैंने ये सब न समझकर गलती की जिसने अथाह मानसिक कष्ट दिया है,
नहीं होता है अब बर्दाश्त.. ये ईश्वर कुछ करता क्यू नहीं है?
काश! मैं पहले समझ पाती कि पुरुष निभाता नहीं निभवाता है, वो आदेश का पालन करवाता है, चुप रहने की हिदायत के साथ उसे खाने, पहनने, रहने की जगह देता है...
हे ईश्वर, मुझे लड़की नहीं होना था, मुझसे अब संघर्ष, कष्ट नहीं बर्दाश्त होता है...