Wednesday, December 22, 2021

बेटी का दर्द

जब स्त्रीत्व रूपी भावना भरा मन खुद पर हावी होता है,
तो मन करता है कि जोड़ लूं उसके आगे हाथ,
छोड़ दूँ सच की लड़ाई,
दे दूं आजादी उसे घर और होटलों में लड़कियां लाने की, हर दो महीने में किसी नए शरीर से खेलने की,
यही तो कहा था उसने कि बंधन में नहीं रह पाएगा,
अगर बाहर किसी लड़की के साथ देखो तो शक मत करना, सवाल मत करना, दोस्तों के साथ दारू तो चलेगी ही,

मग़र ये तब कहा जब उसने मुझे हासिल कर लिया,
उससे पहले तो वो आदर्श व्यक्ति था और मेरी हर बात में उसकी हाँ थी 
जी करता है मान लूं अपनी हार, जो हर स्त्री के हिस्से में लिखी होती है
करू उसकी खूब तारीफ इस दुनिया में, दोस्तों
दुनिया को बताऊँ कि ऐसा ही होता है आदर्श पुरुष
जो कि हर स्त्री का काम होता है
बस पहन ओढ़ कर, खा पीकर परिवार चलाना होता है 
उसे नहीं होता है हक सवाल पूछने का, गलत पर खड़े होने का
यही तो चली आ रही है परंपरा महिलाओं के लिए
मेरी माँ बहुत सी जगहों पर चुप रहती थी हमारे खातिर
लेकिन वो मुझसे नहीं कहती हैं चुप रहने को
वो साथ तो नहीं देती मग़र मुझे खामोश होने की कोई हिदायत भी नहीं देती
उसे लगता है कि उसकी ये बेटी बहुत मजबूत है, हर परिस्थिति में लड़ने की
उसे कभी कभी तो उसे लगता है कि मेरा स्वभाव ही है संघर्ष का
मग़र नहीं, मैं अंदर से बहुत कमजोर हूं किसी भी स्त्री से भी ज्यादा
अब मैं नहीं लड़ना चाहती किसी भी परिस्थिति में
बार बार मन कहता है कि काश कुछ ऐसा हो जाए कि पुराना वो वक्त वापस आए जब मैं खुश थी नयी जिंदगी की शुरुआत से ...

नयी जिंदगी की शुरुआत की सोच ही मेरी गलती थी नयी,
जिंदगी किसी भी पुरुष या उसके ही साथ वैसी ही होगी., लड़की, शराब, दारू, उसके दोस्तों के बीच चुप रहकर, उसके परिवार का खयाल, आदर्श बहु बनने की कवायद..
मैने अब जाना है कि चुप रहना ही एक स्त्री के सुखी विवाहित जीवन का आधार होता है,
बोलती हुई बुद्धिमान लड़कियां कभी भी घर नहीं बसा सकती मेरी तरह..
न जाने क्यू मैंने ये सब न समझकर गलती की जिसने अथाह मानसिक कष्ट दिया है,
नहीं होता है अब बर्दाश्त.. ये ईश्वर कुछ करता क्यू नहीं है?
काश! मैं पहले समझ पाती कि पुरुष निभाता नहीं निभवाता है, वो आदेश का पालन करवाता है, चुप रहने की हिदायत के साथ उसे खाने, पहनने, रहने की जगह देता है...
हे ईश्वर, मुझे लड़की नहीं होना था, मुझसे अब संघर्ष, कष्ट नहीं बर्दाश्त होता है...

स्त्री बनाम पुरुष

कानून की नजर( धर्म नहीं) में स्त्री पुरुष बराबर है, उनके अधिकार, कर्तव्य, काम करने के घण्टे, सैलरी, सभी कुछ एक समान तय किए जाते हैं.

ठीक है कि पुरुषवादी समाज ने स्त्रियों को दबाकर रखा है, खूब अत्याचार किए है और अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने के लिए उसी आधार पर धार्मिक आचरण पर बल दिया ताकि स्त्री पढ़ भी जाए तो धर्म के दबाव में आकर पति भाई को ऊपर का दर्जा दे. इन्हीं सब से निपटने के लिए स्त्रियों के लिए एक धार्मिक ग्रंथ संविधान रचा गया जिससे बाबा साहब के नेतृत्व में पूरी कमेटी ने सभी देशों के संविधान के पढ़कर समझकर लिखा.

परिवार को चलाने के लिए स्त्री पुरुष रूपी दो पहियों की जरूरत होती है.. एक भी छोटा बड़ा हुआ तो गाड़ी ठीक से चल नहीं पाती. अगर आपका पिता, भाई, पति कुछ गलत दबाव डाले, अत्याचार करें, मारपीट करें, पति कहीं और संबद्ध रखे तो इस स्थिति में स्त्री कानून का सहारा ले सकती है और न्याय की मांग कर सकती है... अत्याचार के बदले अत्याचार, प्रताड़ना के बदले प्रताड़ना, की मांग या सोच नहीं रख सकती.. ये गैर कानूनी है और ऐसा करने पर वो खुद भी अपराधी बन जाएगी.
अगर आपका पति कहीं और संबद्ध रख रहा था तो आपने उससे अलग होने का फैसला किया, उस पर केस किया, न्याय की मांग की, समाज ने साथ दिया.. मग़र फिर भी आप उस अत्याचार रूपी पुरुष पर खुद अत्याचार नहीं कर सकती है और न ही इस प्रकिया को सहज मानते हुए किसी और की जिंदगी में घुसकर अपने को बतौर दूसरी लड़की जिससे नाजायज संबद्ध है, इस तौर पर पेश कर सकती है.
पहले तो केवल आप पीड़ित थी मग़र किसी की जिंदगी में जबरन घुसकर आपने उसको मानसिक रूप से प्रताड़ित किया तो एक तो कानूनी रूप से उस लड़की की दोषी बन गई... दूसरी बात कि आपका पति इसी बात पर आपसे तलाक की मांग कर सकता है और कोर्ट मंजूर भी करेगा कि "अगर आप अपने पति से अलग होकर किसी और पुरुष से शारीरिक और मानसिक जरूरत पूरी कर रही है तो आपको पति को भी अलग होकर जीने का अधिकार देना चाहिए"

शायद इसीलिए भारतीय संस्कृति में मान, मर्यादा का पाठ पढाया जाता है... स्त्रियों तो पढ़ लेती थी इसलिए अब तक कदाचार वाले पुरुषों का भी परिवार चलता रहा है मग़र कभी भी किसी माँ तक ने अपने लड़कों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए.. यही वजह है कि स्त्री अत्याचार पीढ़ी दर पीढ़ी चला है. अब दिल्ली की तरफ खासकर वामपंथियों में एक प्रदुषित हवा चल पड़ी है "नारीवाद की" जिसकी आड़ में अब स्त्रियां भी अपने ही चरित्र  का हनन करके पुरुषों से बराबरी करती है लेकिन इसका अंत अगर किसी एक स्त्री के जीवन में भी देखे तो शोषण के रूप में उभर कर ही आता है...
कुल मिलाकर ऐसे तमाम सताये हुए पुरुष भी मुझसे मदद मांगते हैं और अपनी क्षमता के हिसाब से मदद करती भी हूं... मेरा पूर्ण विश्वास इस बात पर है कि स्त्री पुरुष जो किसी भी धर्म, जाति से हो सबको जीने का समान अधिकार मिलना चाहिए... कोई गलत करें तो आप न्याय की मांग करें और मजबूती से खड़े होकर अपने मजबूत स्त्रीत्व का परिचय देते हुए समाज को सकारत्मक संदेश दे....

नारीवाद का वास्तविक अर्थ

नारीवाद/फेमिनिस्ट का मतलब इस घोर पुरुषवादी समाज में स्त्रियों की सत्ता स्थापित करनी है संघर्ष करके, धोखे, कपट से पुरूषों पर जीत हासिल करने और उन्हें दबाने के लिए गाली गलौज करना फेमिनिज्म नही हैं बल्कि उसकी अपराध में गिनती की जाएगी .

आप स्त्री हैं और जिस भी क्षेत्र में है राजनीतिक, सामाजिक ,आर्थिक, सांस्कृतिक ,वहाँ पुरुषों के बराबर से ससम्मान पैठ बनाना ही स्त्रीवाद कहलायेगा और आप स्त्रीवादी.. सोनिया गाँधी की अपेक्षा मायावती को फेमिनिस्ट कहना बेहतर होगा क्यों कि उत्तर प्रदेश जैसे जगह पर खुद को बतौर मुख्यमंत्री स्थापित करना और बेहतर शासन देना किसी पुरुष नेता के भी बस से भी बाहर होता है जो मायावती ने कर दिखाया था ( अब फायदे के विरोधी पार्टियों से जोड़ तोड़ कर रही हैं उद्देश्य भूलकर)
 
एक स्त्री जो मजबूत कहे जाने वाले पुरूष को जन्म देती हैं तो कमजोर तो कहीं से भी नहीं हुई मगर समाज में प्रभुत्व जमाने के लिए उसे शुरू से कमजोर और असहाय बनाने का षड्यंत्र रहा और उसे रोकने के लिए धर्म रुपी बेड़ियाँ पहना दी गई... बस स्त्रियों की अपनी सुषुप्त ताकत को पहचानने और स्थापित करने की जरूरत है छल कपट से दूर ईमानदारी के साथ...

वैसे भी स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं और जब तक समानता आयेगी नहीं बेहतर समाज बन भी नहीं सकता.....