Wednesday, December 22, 2021

स्त्री बनाम पुरुष

कानून की नजर( धर्म नहीं) में स्त्री पुरुष बराबर है, उनके अधिकार, कर्तव्य, काम करने के घण्टे, सैलरी, सभी कुछ एक समान तय किए जाते हैं.

ठीक है कि पुरुषवादी समाज ने स्त्रियों को दबाकर रखा है, खूब अत्याचार किए है और अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने के लिए उसी आधार पर धार्मिक आचरण पर बल दिया ताकि स्त्री पढ़ भी जाए तो धर्म के दबाव में आकर पति भाई को ऊपर का दर्जा दे. इन्हीं सब से निपटने के लिए स्त्रियों के लिए एक धार्मिक ग्रंथ संविधान रचा गया जिससे बाबा साहब के नेतृत्व में पूरी कमेटी ने सभी देशों के संविधान के पढ़कर समझकर लिखा.

परिवार को चलाने के लिए स्त्री पुरुष रूपी दो पहियों की जरूरत होती है.. एक भी छोटा बड़ा हुआ तो गाड़ी ठीक से चल नहीं पाती. अगर आपका पिता, भाई, पति कुछ गलत दबाव डाले, अत्याचार करें, मारपीट करें, पति कहीं और संबद्ध रखे तो इस स्थिति में स्त्री कानून का सहारा ले सकती है और न्याय की मांग कर सकती है... अत्याचार के बदले अत्याचार, प्रताड़ना के बदले प्रताड़ना, की मांग या सोच नहीं रख सकती.. ये गैर कानूनी है और ऐसा करने पर वो खुद भी अपराधी बन जाएगी.
अगर आपका पति कहीं और संबद्ध रख रहा था तो आपने उससे अलग होने का फैसला किया, उस पर केस किया, न्याय की मांग की, समाज ने साथ दिया.. मग़र फिर भी आप उस अत्याचार रूपी पुरुष पर खुद अत्याचार नहीं कर सकती है और न ही इस प्रकिया को सहज मानते हुए किसी और की जिंदगी में घुसकर अपने को बतौर दूसरी लड़की जिससे नाजायज संबद्ध है, इस तौर पर पेश कर सकती है.
पहले तो केवल आप पीड़ित थी मग़र किसी की जिंदगी में जबरन घुसकर आपने उसको मानसिक रूप से प्रताड़ित किया तो एक तो कानूनी रूप से उस लड़की की दोषी बन गई... दूसरी बात कि आपका पति इसी बात पर आपसे तलाक की मांग कर सकता है और कोर्ट मंजूर भी करेगा कि "अगर आप अपने पति से अलग होकर किसी और पुरुष से शारीरिक और मानसिक जरूरत पूरी कर रही है तो आपको पति को भी अलग होकर जीने का अधिकार देना चाहिए"

शायद इसीलिए भारतीय संस्कृति में मान, मर्यादा का पाठ पढाया जाता है... स्त्रियों तो पढ़ लेती थी इसलिए अब तक कदाचार वाले पुरुषों का भी परिवार चलता रहा है मग़र कभी भी किसी माँ तक ने अपने लड़कों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए.. यही वजह है कि स्त्री अत्याचार पीढ़ी दर पीढ़ी चला है. अब दिल्ली की तरफ खासकर वामपंथियों में एक प्रदुषित हवा चल पड़ी है "नारीवाद की" जिसकी आड़ में अब स्त्रियां भी अपने ही चरित्र  का हनन करके पुरुषों से बराबरी करती है लेकिन इसका अंत अगर किसी एक स्त्री के जीवन में भी देखे तो शोषण के रूप में उभर कर ही आता है...
कुल मिलाकर ऐसे तमाम सताये हुए पुरुष भी मुझसे मदद मांगते हैं और अपनी क्षमता के हिसाब से मदद करती भी हूं... मेरा पूर्ण विश्वास इस बात पर है कि स्त्री पुरुष जो किसी भी धर्म, जाति से हो सबको जीने का समान अधिकार मिलना चाहिए... कोई गलत करें तो आप न्याय की मांग करें और मजबूती से खड़े होकर अपने मजबूत स्त्रीत्व का परिचय देते हुए समाज को सकारत्मक संदेश दे....

No comments:

Post a Comment