Wednesday, December 22, 2021

बेटी का दर्द

जब स्त्रीत्व रूपी भावना भरा मन खुद पर हावी होता है,
तो मन करता है कि जोड़ लूं उसके आगे हाथ,
छोड़ दूँ सच की लड़ाई,
दे दूं आजादी उसे घर और होटलों में लड़कियां लाने की, हर दो महीने में किसी नए शरीर से खेलने की,
यही तो कहा था उसने कि बंधन में नहीं रह पाएगा,
अगर बाहर किसी लड़की के साथ देखो तो शक मत करना, सवाल मत करना, दोस्तों के साथ दारू तो चलेगी ही,

मग़र ये तब कहा जब उसने मुझे हासिल कर लिया,
उससे पहले तो वो आदर्श व्यक्ति था और मेरी हर बात में उसकी हाँ थी 
जी करता है मान लूं अपनी हार, जो हर स्त्री के हिस्से में लिखी होती है
करू उसकी खूब तारीफ इस दुनिया में, दोस्तों
दुनिया को बताऊँ कि ऐसा ही होता है आदर्श पुरुष
जो कि हर स्त्री का काम होता है
बस पहन ओढ़ कर, खा पीकर परिवार चलाना होता है 
उसे नहीं होता है हक सवाल पूछने का, गलत पर खड़े होने का
यही तो चली आ रही है परंपरा महिलाओं के लिए
मेरी माँ बहुत सी जगहों पर चुप रहती थी हमारे खातिर
लेकिन वो मुझसे नहीं कहती हैं चुप रहने को
वो साथ तो नहीं देती मग़र मुझे खामोश होने की कोई हिदायत भी नहीं देती
उसे लगता है कि उसकी ये बेटी बहुत मजबूत है, हर परिस्थिति में लड़ने की
उसे कभी कभी तो उसे लगता है कि मेरा स्वभाव ही है संघर्ष का
मग़र नहीं, मैं अंदर से बहुत कमजोर हूं किसी भी स्त्री से भी ज्यादा
अब मैं नहीं लड़ना चाहती किसी भी परिस्थिति में
बार बार मन कहता है कि काश कुछ ऐसा हो जाए कि पुराना वो वक्त वापस आए जब मैं खुश थी नयी जिंदगी की शुरुआत से ...

नयी जिंदगी की शुरुआत की सोच ही मेरी गलती थी नयी,
जिंदगी किसी भी पुरुष या उसके ही साथ वैसी ही होगी., लड़की, शराब, दारू, उसके दोस्तों के बीच चुप रहकर, उसके परिवार का खयाल, आदर्श बहु बनने की कवायद..
मैने अब जाना है कि चुप रहना ही एक स्त्री के सुखी विवाहित जीवन का आधार होता है,
बोलती हुई बुद्धिमान लड़कियां कभी भी घर नहीं बसा सकती मेरी तरह..
न जाने क्यू मैंने ये सब न समझकर गलती की जिसने अथाह मानसिक कष्ट दिया है,
नहीं होता है अब बर्दाश्त.. ये ईश्वर कुछ करता क्यू नहीं है?
काश! मैं पहले समझ पाती कि पुरुष निभाता नहीं निभवाता है, वो आदेश का पालन करवाता है, चुप रहने की हिदायत के साथ उसे खाने, पहनने, रहने की जगह देता है...
हे ईश्वर, मुझे लड़की नहीं होना था, मुझसे अब संघर्ष, कष्ट नहीं बर्दाश्त होता है...

स्त्री बनाम पुरुष

कानून की नजर( धर्म नहीं) में स्त्री पुरुष बराबर है, उनके अधिकार, कर्तव्य, काम करने के घण्टे, सैलरी, सभी कुछ एक समान तय किए जाते हैं.

ठीक है कि पुरुषवादी समाज ने स्त्रियों को दबाकर रखा है, खूब अत्याचार किए है और अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने के लिए उसी आधार पर धार्मिक आचरण पर बल दिया ताकि स्त्री पढ़ भी जाए तो धर्म के दबाव में आकर पति भाई को ऊपर का दर्जा दे. इन्हीं सब से निपटने के लिए स्त्रियों के लिए एक धार्मिक ग्रंथ संविधान रचा गया जिससे बाबा साहब के नेतृत्व में पूरी कमेटी ने सभी देशों के संविधान के पढ़कर समझकर लिखा.

परिवार को चलाने के लिए स्त्री पुरुष रूपी दो पहियों की जरूरत होती है.. एक भी छोटा बड़ा हुआ तो गाड़ी ठीक से चल नहीं पाती. अगर आपका पिता, भाई, पति कुछ गलत दबाव डाले, अत्याचार करें, मारपीट करें, पति कहीं और संबद्ध रखे तो इस स्थिति में स्त्री कानून का सहारा ले सकती है और न्याय की मांग कर सकती है... अत्याचार के बदले अत्याचार, प्रताड़ना के बदले प्रताड़ना, की मांग या सोच नहीं रख सकती.. ये गैर कानूनी है और ऐसा करने पर वो खुद भी अपराधी बन जाएगी.
अगर आपका पति कहीं और संबद्ध रख रहा था तो आपने उससे अलग होने का फैसला किया, उस पर केस किया, न्याय की मांग की, समाज ने साथ दिया.. मग़र फिर भी आप उस अत्याचार रूपी पुरुष पर खुद अत्याचार नहीं कर सकती है और न ही इस प्रकिया को सहज मानते हुए किसी और की जिंदगी में घुसकर अपने को बतौर दूसरी लड़की जिससे नाजायज संबद्ध है, इस तौर पर पेश कर सकती है.
पहले तो केवल आप पीड़ित थी मग़र किसी की जिंदगी में जबरन घुसकर आपने उसको मानसिक रूप से प्रताड़ित किया तो एक तो कानूनी रूप से उस लड़की की दोषी बन गई... दूसरी बात कि आपका पति इसी बात पर आपसे तलाक की मांग कर सकता है और कोर्ट मंजूर भी करेगा कि "अगर आप अपने पति से अलग होकर किसी और पुरुष से शारीरिक और मानसिक जरूरत पूरी कर रही है तो आपको पति को भी अलग होकर जीने का अधिकार देना चाहिए"

शायद इसीलिए भारतीय संस्कृति में मान, मर्यादा का पाठ पढाया जाता है... स्त्रियों तो पढ़ लेती थी इसलिए अब तक कदाचार वाले पुरुषों का भी परिवार चलता रहा है मग़र कभी भी किसी माँ तक ने अपने लड़कों को ऐसी शिक्षा नहीं देनी चाहिए.. यही वजह है कि स्त्री अत्याचार पीढ़ी दर पीढ़ी चला है. अब दिल्ली की तरफ खासकर वामपंथियों में एक प्रदुषित हवा चल पड़ी है "नारीवाद की" जिसकी आड़ में अब स्त्रियां भी अपने ही चरित्र  का हनन करके पुरुषों से बराबरी करती है लेकिन इसका अंत अगर किसी एक स्त्री के जीवन में भी देखे तो शोषण के रूप में उभर कर ही आता है...
कुल मिलाकर ऐसे तमाम सताये हुए पुरुष भी मुझसे मदद मांगते हैं और अपनी क्षमता के हिसाब से मदद करती भी हूं... मेरा पूर्ण विश्वास इस बात पर है कि स्त्री पुरुष जो किसी भी धर्म, जाति से हो सबको जीने का समान अधिकार मिलना चाहिए... कोई गलत करें तो आप न्याय की मांग करें और मजबूती से खड़े होकर अपने मजबूत स्त्रीत्व का परिचय देते हुए समाज को सकारत्मक संदेश दे....

नारीवाद का वास्तविक अर्थ

नारीवाद/फेमिनिस्ट का मतलब इस घोर पुरुषवादी समाज में स्त्रियों की सत्ता स्थापित करनी है संघर्ष करके, धोखे, कपट से पुरूषों पर जीत हासिल करने और उन्हें दबाने के लिए गाली गलौज करना फेमिनिज्म नही हैं बल्कि उसकी अपराध में गिनती की जाएगी .

आप स्त्री हैं और जिस भी क्षेत्र में है राजनीतिक, सामाजिक ,आर्थिक, सांस्कृतिक ,वहाँ पुरुषों के बराबर से ससम्मान पैठ बनाना ही स्त्रीवाद कहलायेगा और आप स्त्रीवादी.. सोनिया गाँधी की अपेक्षा मायावती को फेमिनिस्ट कहना बेहतर होगा क्यों कि उत्तर प्रदेश जैसे जगह पर खुद को बतौर मुख्यमंत्री स्थापित करना और बेहतर शासन देना किसी पुरुष नेता के भी बस से भी बाहर होता है जो मायावती ने कर दिखाया था ( अब फायदे के विरोधी पार्टियों से जोड़ तोड़ कर रही हैं उद्देश्य भूलकर)
 
एक स्त्री जो मजबूत कहे जाने वाले पुरूष को जन्म देती हैं तो कमजोर तो कहीं से भी नहीं हुई मगर समाज में प्रभुत्व जमाने के लिए उसे शुरू से कमजोर और असहाय बनाने का षड्यंत्र रहा और उसे रोकने के लिए धर्म रुपी बेड़ियाँ पहना दी गई... बस स्त्रियों की अपनी सुषुप्त ताकत को पहचानने और स्थापित करने की जरूरत है छल कपट से दूर ईमानदारी के साथ...

वैसे भी स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं और जब तक समानता आयेगी नहीं बेहतर समाज बन भी नहीं सकता.....

Wednesday, November 24, 2021

धर्म को बलात्कार से जोड़कर प्रसिद्धि पाते छद्म पुरुष

 सार्वजनिक मंच / वैश्विक स्तर पर जल्दी प्रसिद्धि पाने के लिए संवेदनशील मुद्दों पर (स्त्री के साथ बलात्कार /देश प्रेम की बातेँ) कुछ छद्म पुरुष रूपी कलाकार बोलकर खूब तालियां बटोरते है मग़र जब इन्हें व्यक्तिगत रूप से जाने तो पता चलेगा कि ज्यादातर लोगों ने कभी अपने घर में भी स्त्री हक की कोई बात नहीं की होगी. सार्वजनिक रूप से कुछ गलत होते देखकर आवाज भी नहीं उठाई होगी जो कि हर जिम्मेदार नागरिक का फर्ज है. 

जहां ये स्त्री के साथ बलात्कार की बात करते हैं और उसे सीधे धर्म से जोड़ देते हैं... मतलब अगर धर्म से देवी पूजा खत्म की जाए तो शायद बलात्कार के आकड़े कम हो जाएंगे.. मग़र कोई इनसे पूछे कि जिस देश के मंच पर खड़े होकर देवी पूजा और बलात्कार को जोड़ रहे हैं, उस देश में तो स्त्री रूपी देवी की पूजा नहीं होती फिर वहाँ छेड़छाड़, बलात्कार के आकड़े क्यू ज्यादा है? क्या वाकई धर्म से बलात्कार का कोई संबद्ध है..? नहीं है तो स्त्री अपराध, बलात्कार को अलग से भी कविता सुनाया जा सकता है? उसे धर्म से जोड़ने की क्या जरूरत आन पड़ी? आपको पता है कि ऐसी जरूरत थी और बहुत बड़ी.. पहली तो.. विवादस्पद बोल देने से जल्दी सस्ती प्रसिद्धि मिल जाती है और दूसरी कि उनके ऑडियंस हिन्दू धर्म को लेकर कुंठित है और ऐसे मज़ाक उड़ाने में आत्मिक संतुष्टि मिलती है. पहले भी कई बार लिख चुकी है और फिर लिख रही हूँ कि हिन्दू धर्म के अलावा भी अन्य धर्मों में मंच पर मज़ाक उड़ाने लायक तमाम बातेँ है मग़र उसके बाद कलाकार को जीवित नहीं छोड़ा जाएगा... इसलिए प्रगतिशील लेखक, कवि ऐसी जुर्रत कर ही नहीं पाते केवल और केवल हिन्दू धर्म भी ऐसे भद्दे मज़ाक की सहूलियत देता है.
बात अगर वाकई स्त्री सम्मान और अपराध खत्म करने की होती तो क्या कंगना की अर्ध नग्न फोटो डालकर भद्दे भद्दे पोस्ट भी किए जाते हैं? अश्लील कार्टून भी बनाए जाते... उसकी बातों का वैचारिक स्तर पर ही विरोध हो सकता है. जो भी महान कविवर का साथ दे रहे हैं और साफ़ साफ़ कह रहे हैं कि वास्तविक स्थिति का चित्रण किया है.. वो कह रहे हैं कि सच ही तो बोला है कि जब स्त्री को देवी रूप में पूजा जाता है तो रात में बलात्कार क्यू?.. इन्हीं में से आधे से ज्यादा लोग कंगना का ऑनलाइन बलात्कार लिख कर, फोटो रोज डालते हैं.. किसी महिला से खफा होते हैं तो ऑनलाइन शोषण शुरू कर देते हैं....असल में ऐसे दोगलो को मानसिक इलाज की जरूरत है. स्त्री की कोई बात नागवार गुजरे तो उस पर यौन हमले, भद्दी बातेँ या व्यक्तिगत रूप से परेशान करने तक ही पुरुष वर्ग सोच पाता है और वज़ह भी उसका सामाजिक परिवेश है. उसे इस पुरुष प्रधान समाज ने यही सिखाया है कि स्त्री की बात बुरी लगे तो उसका चरित्र हनन कर दो. अकेली दिखे तो उसे फ्लर्ट करने की कोशिश करो, सम्भव हो तो उसे बिस्तर तक ले जाओ. ऐसा करते हुए भी कोई मंच मिल जाने पर स्त्री अत्याचार, अपराध, बलात्कार के खिलाफ बोलकर वाह वाही लूटते है. जितने भी लोग वॉशिंग्टन में कॉमेडी शो में मौजूद थे और जितने भी लोगों ने ट्विटर, Facebook पर कविवर के Favour मे लिखा, बस अगर केवल उतने ही लोग स्त्री सम्मान करने लगे तो स्त्री अपराध के आकडों में बड़ी गिरावट आएगी. हमें मंच पर खड़े होकर केवल वाहवाही लूटने के बजाय व्यावहारिक रूप से अपराध को रोकने की जरूरत है क्यू कि सवाल हमारी ही अपनी बेटियों का है. 

Sunday, March 21, 2021

जीन्स पर संस्कारी पैबंद

https://www.mediavigil.com/op-ed/rita-sharmas-comment-on-tirath-rawats-statement-on-ripeed-jeans/

जीन्स पर संस्कारी पैबंद या स्त्री स्वतंत्रता से घबराये तीरथ!
नए नवेले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ रावत सिंह का एक बच्चों के लिए आयोजित कार्यक्रम में मंच से ये बयान आता है कि Ripeed Jeans पहनने और घुटने दिख जाने स्त्री अपने बच्चों को कैसे और क्या संस्कार देगी? वो अपना कोई पुराना संस्मरण याद करते हुए इस बात को कोट करते हैं. संस्कार की पाठशाला आयोजित करते हुए वो ये एकदम भूल जाते हैं कि किसी पारिवारिक कार्यक्रम के बजाय वो एक मुख्यमंत्री होने की हैसियत से एक मंच पर खड़े हैं. उन्हें ये भी नहीं याद रहता है कि मुख्यमंत्री का काम प्रदेश का विकास करना है, उसको चर्चा स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, विकास की करनी है..स्त्रियों को संस्कार सिखाने वाले ठेकेदार तो हर घर में पाए जाते हैं.
उनके पूरे संस्मरण को ध्यान से सुन लिया जाए तो पता चलता है कि ये कानून विरुद्ध भी है. कानून कहता है कि 20 Sec तक लगातार किसी को घूरना अपराध की श्रेणी में आता है.. जिस तरह से वो बूट से लेकर हाथ के कड़े का बखान करते हैं ये दुस्साहस एक मिनट से ऊपर का हो जाता है. उक्त घटना अगर कोरी गप्प नहीं है तो वर्णित स्त्री सामने आकर FIR की मांग करें तो संस्कार के ठेकेदार ये जनाब मुश्किल में आ सकते हैं. अगर ऐसे बेहूदे कटाक्ष किसी और विकसित देश में हुए होते तो अब तक लीगल एक्शन ले लिया जाता.
भारत जैसे सनातनी देश का ये दुर्भाग्य रहा है कि यहां देवी देवालय में पूजी जाती है मग़र धरती पर उसके ही रूप का खूब शोषण होता है. शायद ही कोई दिन ऐसा होता है जब किसी लड़की के साथ हिंसा, बलात्कार, एसिड अटैक हत्या की खबर न आती हो.. वज़ह भी इतनी ही होती है कि किसी रूप में उन्होंने उक्त पुरुष के किसी इच्छा को मानने से इंकार किया होगा नतीजन उनके साथ ऐसा हादसा होता है.
 सुनने में तो सीएम का बयान एक कटाक्ष भर लगता है और Pannel में बैठी बीजेपी की महिला नेता इसे संस्कार से जोड़ती है लेकिन Ripped Jeans केवल एक फैशन भर है ये एक बेटी के पिता खुद सीएम सहित हम सभी को पता है. आज फटी जीन्स फैशन में है कल लूज जीन्स होगी.. कभी सूट ट्रेंड में होता है कभी प्लाजो , कभी पैंट, तो कभी जीन्स, कभी फटी जीन्स .. यही फटी जीन्स वाली लड़की फैशन आने पर कुर्ता प्लाजो में दिखेगी तो क्या आज की असंस्कारी लड़कियां कल को समाज के लिए संस्कारी हो जाएंगी?
पुरुष प्रधान समाज में न जाने क्यू एक स्त्री का शरीर इतना आपत्तिजनक है कि उसकी कमर, पेट, टांगे दिखने भर से पुरुष उत्तेजित हो जाते हैं, रेप कर डालते हैं.. छेड़छाड़ और अन्य घटनाओं को अंजाम दे देते हैं. गौर तलब हो कि इसी स्त्री शरीर से हर पुरुष का जन्म हुआ है तो उसकी इमेज ममतामयी माँ के बजाय एक सेक्स डाॅल के रूप में फिर किसने निर्धारित की? भारत जैसे संवैधानिक देश में जहां एक स्त्री के अधिकार पुरुष के समान ही है फिर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित क्यू किया जाता है. प्रताड़ना का स्तर इतना ऊपर है कि एक मुख्यमंत्री किसी सार्वजनिक समारोह में स्त्री को प्रताड़ित करने की हिम्मत रखते हैं. जब सीएम ऐसी बाते मंच से कह रहे हैं तो उनके शागिर्द मौका पाते ही कैसा सुलूक करेंगे? महिलाओं द्वारा विरोध होने पर भले ही सीएम की तरह से माफ़ीनामा आ गया हो लेकिन इसके बावजूद पुरुषों की गाली गलौज, अभद्रता सोशल मीडिया पर चल रही है.. वो विदेशी माडल, पोर्न स्टार की अर्ध नग्न फोटो डालकर स्त्री और उसकी सीमा निर्धारित कर रहे हैं.. अभद्रता की सारी सीमा पार कर रहे हैं.. किसी राष्ट्रीय नेता का मंच से ऐसा बयान ऐसे पुरुषों का हौसला सौ गुना बढ़ा देता हो जो छेड़छाड़, रेप के लिए स्त्री शरीर, उसके कपड़े को दोष देते हैं.. हम अक्सर सुनते हैं कि रात को क्यू जा रही थी? छोटे कपड़े क्यू पहने थे? ऐसे में घटना तो होनी ही थी..
ऐसा माहौल है कि Toddler से लेकर 60-70 साल तक की महिलाएं सुरक्षित नहीं है.. संविधान ने भले ही समान अधिकार दे दिए हो.. तमाम महिलाओं के लिए सरकारी सुविधाएं पेपर में मौजूद हो मगर उसे पाने के लिए बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी है.. हर स्त्री को हर दिन अपने अधिकारों के लिए खड़े रहना होगा.. हर दिन लड़ कर ही अधिकार, स्वतंत्रता हासिल किया जा सकता है.. समान अधिकारों के लिए डट कर खड़े होने पर ही ऐसे बड़बोले संस्कार के ठेकेदारों का मुँह बंद कराया जा सकता है.. 

रीटा शर्मा 
सोशल ऐक्टिविस्ट 
लखनऊ 

Sunday, January 3, 2021

समाजसेवा और नेतागीरी भी है जरूरी

https://www.sarita.in/society/social-service-and-politicians-are-also-important

समाजसेवा और नेतागीरी भी है जरूरी
रीता शर्मा ने बताया, ‘‘लौकडाउन में जब देशभर में तालाबंदी थी, उस समय हमारी संस्था द्वारा गांवदेहात की लड़कियों को ट्रेनिंग दे कर उन्हीं के घर पर डिजाइनर मास्क सिलने की सहूलियत दी गई.

सुनील शर्मा | January 2, 2021
  

साल 2020 में कोरोना महामारी की वजह से मचे मौत के तांडव ने देशदुनिया को हिला दिया. जब भारत में लौकडाउन हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से अपील करते हुए ‘जो जहां है वहीं रहे’ की अपील की तो मानो भगदड़ सी मच गई. पूरा देश एकदम बंद हो गया. सड़कें सुनसान और घर वीरान से दिखने लगे. लोग घरों में कैद जो हो गए थे.
इस से शहरों में रोजगार कमाने आए लाखोंकरोड़ों लोगों पर अपने सिर की छत और रोजीरोटी गंवाने का खतरा बढ़ गया. लिहाजा, बहुत से लोग अपने परिवार समेत सिर पर सामान लादे निकल पड़े सड़कों पर अपनेअपने गांव की ओर. पर जब मुसीबतें आईं तो उन्हें जरूरत पड़ी किसी ऐसे की जो उन की मदद कर सके.
ये भी पढ़ें- मंदिर और मूर्तियां बनाना कहां का विकास है?
ऐसा हुआ भी. बहुत से अनजान लोगों ने बिना किसी लालच के बहुत से भूखों को खाना दिया, उन की प्यास बु झाई, छाले पड़े पैरों पर मरहम लगाया. पर एक इंसान तो मानो सुपरहीरो बन गया. नाम था सोनू सूद, जो फिल्मों में तो विलेन बनता था, पर कोरोनाकाल में ऐसा नायक बना कि बड़ेबड़े हीरो पीछे छूट गए.

पंजाब के मोगा जिले से ताल्लुक रखने वाले सोनू सूद ने लौकडाउन के दौरान प्रवासियों को उन के घर पहुंचाने में मदद की, मजदूरों के लिए बसों, ट्रेनों का इंतजाम किया ताकि वे अपनेअपने घरों तक पहुंच पाएं.
यही वजह है कि सोनू सूद इसी विषय पर एक किताब भी लिख रहे हैं. यही नहीं, उन्होंने 3 लाख प्रवासियों को नौकरी दिलाने का भी वादा किया है. सवाल उठता है कि सोनू सूद ने यह समाजसेवा क्यों की और क्या समाजसेवा और राजनीति के जरिए लोग दूसरों की बिना किसी लालच के मदद कर सकते हैं?

जहां तक सोनू सूद का सवाल है, तो जब उन्होंने मुसीबत के मारे किसी पहले शख्स के बारे में सुना होगा तो इंसानियत के तौर पर उस की मदद की होगी, फिर धीरेधीरे यह कारवां बढ़ता गया.
इस से पता चलता है कि सोनू सूद ही नहीं, बल्कि कोई भी इंसान इस तरह किसी की मदद कर सकता है. यहां यह बात भी उजाले में आती है कि अगर मौका मिले तो हमें समाजसेवा और राजनीति से जुड़ कर कोई ऐसा काम जरूर करना चाहिए जिस से लोगों का भला हो और हमारा आत्मविश्वास बढ़े.
इस सिलसिले में समाजसेवी रीता शर्मा ने काफी अहम बातें बताईं. वे लखनऊ, उत्तर प्रदेश में एक स्वयंसेवी संस्था ‘शक्तिस्वरूपा सेवा संस्थान’ चलाती हैं, जिस में सिलाईकटाई, बुनाई, डिजाइनिंग कोर्स, सैल्फडिफैंस ट्रेनिंग, महिला जागरूकता मुहिम जैसे कार्यक्रम मुफ्त चलाए जाते हैं, साथ ही कानूनी मदद भी दी जाती है.
ये भी पढ़ें- New Year Special: इन 11 टिप्स को अपनाकर नए साल में करें जिंदगी की नई शुरुआत
रीता शर्मा ने बताया, ‘‘लौकडाउन में जब देशभर में तालाबंदी थी, उस समय हमारी संस्था द्वारा गांवदेहात की लड़कियों को ट्रेनिंग दे कर उन्हीं के घर पर डिजाइनर मास्क सिलने की सहूलियत दी गई. इस से न केवल उन के समय का अच्छा इस्तेमाल हुआ, बल्कि उन के हाथ में अच्छे पैसे भी आए, साथ ही मास्क पहनने की जरूरत भी सम झ आई.’’
बता दें कि बीते एक साल से रीता शर्मा सामाजिक कामों के साथसाथ राजनीतिक रूप से सक्रिय रही हैं. उन का मानना है कि अगर आप के पास मौका और समय है तो सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय रहना चाहिए खासकर महिलाओं को, इस से न केवल जरूरतमंदों को मदद मिलती है और समय का सही इस्तेमाल होता है, बल्कि समाज में एक अच्छी पहचान भी बनती है.
रीता शर्मा का कहना है, ‘‘अगर महिलाओं की बात की जाए तो उन का दायरा काफी सीमित होता है. सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता उन के संपर्क को बढ़ाती हैं. नएनए लोगों के संपर्क में आने से वे नएनए विचारों से अवगत होती हैं.’’
इस के अलावा रीता शर्मा का मानना है कि महिलाओं से संबंधित सामाजिक कुरीतियों, सामाजिक असमानता, भेदभाव, निरक्षरता, महिला अपराध आदि पर खासतौर से काम कर के महिलाएं सामाजिक व्यवस्था को भी सुधार सकती हैं.
पर दिक्कत यह है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पर बात तो जरूर होती है लेकिन वास्तविक रूप से बहुत कम महिलाएं इस प्लेटफौर्म पर दिखती हैं. अगर राजनीति में महिलाएं सक्रिय रहती हैं तो अन्य क्षेत्रों में उन की भूमिका ज्यादा दिखाई देगी. लिहाजा, जिन की रुचि हो उन्हें राजनीति में अपनी भूमिका जरूर अदा करनी चाहिए.
दिल्ली में मालती फाउंडेशन चलाने वाली मधु गुप्ता ने बताया, ‘‘हम सभी समाज का हिस्सा हैं और समाज के प्रति हमारी भीप्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं, इसलिए हमें भी सामाजिक हित में कुछ काम जरूर करने चाहिए.
‘‘दुनिया में हर कोई हमेशा ही सक्षम नहीं रहता है, उसे कभी न कभी मदद की भी जरूरत पड़ती है और हमारा सभी का समाज में रहते हुए यह फर्ज बनता है कि हम दूसरों की मदद के लिए आगे आएं. यह मदद हम अपनी हैसियत के मुताबिक किसी भी रूप में कर सकते हैं, बस करने का जज्बा होना चाहिए.
‘‘मेरा मानना है कि राजनीति से जुड़ कर भी हम समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभा सकते हैं, अपने आसपड़ोस में फैली समस्याओं का आप राजनीति से जुड़ कर जल्दी निदान कर सकते हैं. वैसे भी हम सब समाज सुधारने या देश सुधारने की उम्मीद दूसरों से ही करते हैं, खुद क्यों नहीं करते? मेरी मानें तो राजनीति भी एक तरह की समाजसेवा ही है.
‘‘मैं एक गृहिणी हूं और राजनीति में भी सक्रिय हूं. 2 छोटे बच्चों की मां होने पर मेरे लिए यह सब करना बेहद चुनौतीभरा है, पर समाजसेवा मन को सुकून देती है, इसीलिए कभी पीछे नहीं हटती. मैं बस यही कहना चाहती हूं कि हर इंसान को समाजसेवा या राजनीति से जरूर जुड़ना चाहिए.’’
उत्तराखंड राज्य अलग बनने के बाद वहां के पहाड़ी जनपदों से बेतहाशा पलायन को देखते हुए साल 2016 में ‘पलायन : एक चिंतन समूह’ बनाया गया. इस समूह का मकसद पलायन से प्रभावित गांवों का दौरा कर वहां के हालात का जायजा लेना, पलायन की वजहों की तह में जाना व इसे रोकने के उपाय ढूंढ़ना था.
पहाड़ में पर्यटन के जमीनी विशेषज्ञ रतन सिंह असवाल की अगुआई में इस समूह द्वारा उत्तराखंड में पलायन से सब से ज्यादा प्रभावित पौड़ी जनपद के हैडक्वार्टर में एक विचारगोष्ठी व कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिस में बड़ी तादाद में प्रवासियों के साथ विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने पलायन की वजहों व इसे कम करने के उपायों पर चर्चा की.
साल 2018 में इस संस्था की मुहिम द्वारा पौड़ी जनपद की नयारघाटी के शीला बांघाट गांव में 8 हैक्टेयर बंजर जमीन को आबाद कर वहां पर्वतीय खेतीबाड़ी और आजीविका उन्नयन केंद्र बना कर खेती शुरू की गई, साथ ही वहां नदी किनारे कैंप गोल्डनमहाशीर की शुरुआत कर खेती के साथ पर्यटन से आजीविका के मौके पैदा करने की पहल की गई.
इस समूह द्वारा खेती के साथ पर्यटन की गतिविधियों से पहाड़ पर बदलाव आने के बाद उत्तराखंड सरकार द्वारा 19 से 22 नवंबर तक नयारघाटी के बिलखेत में ‘प्रथम नयारघाटी साहसिक खेल महोत्सव’ का आयोजन किया गया.
रतन सिंह असवाल का मानना है, ‘‘मेरे लिए यह समाजसेवा, नहीं बल्कि एक मिशन है. पहाड़ से लोगों के पलायन के बाद नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट गई है, पहाड़ी रीतिरिवाजों को भूल गई है. इस से उत्तराखंड को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है.
‘‘हमारी संस्था ‘पलायन : एक चिंतन समूह’ नौजवानों को पहाड़ पर रोजगार दिलाने की कोशिश कर रहा है. यहां पर पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं और हम इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.’’
सच है कि समाजसेवा एक माने में किसी मिशन से कम नहीं है. अगर आप छोटे स्तर पर भी किसी जरूरतमंद की मदद करते हैं तो खुशी तो बढ़ी ही मिलती है.
बहुत से लोगों ने समाजसेवा और राजनीति का नाम ले कर अपना निजी फायदा भी उठाया है. ऐसे लोगों के झांसे में न आएं और न ही दूसरों की मदद करने के जज्बे को कम होने दें.