बस एक ग्रुप बनाकर कानून को अपने हाथ में लेकर न्याय लेने और देने का जो भयंकर रूप सामने आ रहा है वो सामाजिक विघटन का परिचायक है l अभी हाल में ही चंदन गुप्ता की हिंसा में गोली से मौत और मुहम्मद अकरम का गंभीर रूप से घायल होना तथा पिछले दिनों शंभू रेगर द्वारा एक मुस्लिम मज़दूर की निर्मम हत्या और फिर उसकी Vedio बनाकर सोशल मीडिया पर डाल देना, अपने बचाव में तर्क देना और हत्या को सही ठहराना ये बताना ये जाहिर करता है कि हम कानून में आस्था नहीं रखते और हर मुद्दों पर अपनी मर्जी से खुद ही न्याय कर लेंगे l कासगंज की घटना में भीड़ का उग्र होना और एक दूसरे पर वार करना कई बात सोचने पर मजबूर करता है जैसे कि तिरंगा यात्रा और झंडा रोहण के बीच पत्थर और गोली बम कहां से आ गए और इसके भनक इन लोगों या आसपास के लोगों को क्यू नहीं लगी और गणतंत्र दिवस के अवसर पर पुलिस की सुरक्षा क्यू नहीं थी? दूसरी तरफ देखे तो बांग्लादेशी की हत्या के बाद उसकी Vedio इतनी वायरल कैसे हुई? क्या वो इतना चर्चित था और क्या वो ऐसा आदर्शवादी व्यक्ति था? कि जिसके समर्थन में लोग हाई कोर्ट में भी बवाल करने से पीछे न हटे?
इससे एक बात तो साफ नज़र आती है कि हमारे तंत्र में कुछ लोग हर मौके को भुनाने, उसे जाति का रंग देने और दंगा करने मे माहिर हैं और मौके की तलाश में रहते हैंl
एक छोटी सी बात पर बहस और फिर एक दूसरे के खून के प्यासे होना क्या एक वाकई प्रजातंत्र की निशानी है और माहौल बिगड़ता देखकर आखिर कोई उसे संभालने की कोशिश क्यू नहीं करता? ना बड़े बुजुर्ग और न ही पुलिस.. तिरंगा यात्रा और ध्वजा रोहण के बीच गोलीबारी कैसे और क्यों हुई इस पर सख्त छानबीन और कार्यवाही होनी चाहिए वही शंभू रेगर के केस में जब असलियत सामने आयी है तो वो जलालत भरी थी .. शंभू की Vedio को वायरल करने वाले, उसकी जयकार करने वाले, उसके अकाउंट में पैसा डालने वालों पर सख्त कार्रवाई तुरंत होनी चाहिए वरना ये सामाजिक जहर एक एक करके पूरी व्यवस्था को लील जाएगा l पिछले साल की ही बात है कि शक के आधार पर अखलाक की हत्या करना कौन से कानून में आता है? अगर ये बात सच थी भी तो किसी की हत्या का अधिकार क्या हमें है? हम कुछ गलत देखने पर पुलिस को रिपोर्ट क्यू नहीं करते? शायद हमारा विश्वास नहीं है कुछ लोगों के ले देकर कानून का उल्लंघन करने के चलते l इस पर एक व्यापक चर्चा और जागरुकता हर पुलिस अधिकारी को अपने स्तर पर करनी चाहिए ताकि जनता दंगाइयों से न जुड़ कर कानून के साथ खड़ी हो और भीड़तंत्र द्वारा हो हिंसक हमले पर रोक लग सके l
समाज की एक बड़ी समस्या बेरोजगारी और उसका फायदा कुछ लोगों द्वारा उठाकर तरह तरह के संगठन बनाकर उल जुलूल मांग और हिंसा करना बेहद ही शर्मनाक है.. लेकिन इसमें एक सोचने लायक बात यह भी है कि सड़को पर हिंसा करने वाले, बस पर पत्थर फेंकने और आगजनी करने वाले ये लोग कहां से आ रहे हैं और इनको संचालित कौन कर रहा है? ये ठीक कश्मीर के पत्थर बाज़ो की तरह एक भटके हुए बेरोजगार युवा है जिन्हें कुछ पैसे और प्रसिद्धि के लालच में तैयार किया जाता है, बिना ये सोचे कि आगे इनका भविष्य क्या होगा?
अब तो ये एक फ़ैशन सा चल पड़ा है.. एक थोड़ा पढ़ा लिखा और बोलने में माहिर व्यक्ति नेता बन एक संगठन बनाता है उसमें लालच देकर बेरोजगार युवा को शामिल करता है.. फिर जगह जगह उपद्रव और आगजनी के बाद News channel में प्रमुखता से दिखाया जाता है और कुछ ही दिनों में हीरो बनकर चैनल के स्टूडियो में बैठ कर अपने संघठन पर विस्तार से चर्चा कर अपने को advertise करता है और फिर असामाजिक तत्वों से पैसे मिलना शुरू होता है और कुछ ही दिनों में सड़क पर धूल फाकने वाला व्यक्ति एक luxury जीवन जीने लगता है और देर सवेर राजनीति की ओर रुख कर लेता है l हम अपने आसपास नज़र घुमा कर देखे तो ऐसे अनगिनत मामले मिल जाएंगे l
ये समाज के लिए अत्यंत घातक ज़हर है l प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी ऐसे अपराधिक और उपद्रवी व्यक्तियों के बुलाने पर प्रतिबंध लगाया जाए जिस पर कोई अपराधिक मुकदमा या हिंसा के आरोप हो l बात तो राजनीति में भी अपराधिक व्यक्तियों के चुनाव न लड़ने की हो रही थी मगर अभी उससे मुद्दा भीड़तंत्र का उभर कर आ रहा है l हिंसा करने, कराने और सोशल मीडिया पर उसे फैलाने वाले के खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था की जाए l सोशल मीडिया या समाज में हो रहे ऐसे भड़काववादी गतिविधियों की रिपोर्ट करने वालों का मनोबल बढ़ाया जाए ताकि हम निश्चित होकर पुलिस को इत्तिला कर सके क्यूकि कई बार हम डर से भी अपनी आंखे बंद किए रहते हैंl



