सार्वजनिक मंच / वैश्विक स्तर पर जल्दी प्रसिद्धि पाने के लिए संवेदनशील मुद्दों पर (स्त्री के साथ बलात्कार /देश प्रेम की बातेँ) कुछ छद्म पुरुष रूपी कलाकार बोलकर खूब तालियां बटोरते है मग़र जब इन्हें व्यक्तिगत रूप से जाने तो पता चलेगा कि ज्यादातर लोगों ने कभी अपने घर में भी स्त्री हक की कोई बात नहीं की होगी. सार्वजनिक रूप से कुछ गलत होते देखकर आवाज भी नहीं उठाई होगी जो कि हर जिम्मेदार नागरिक का फर्ज है.
जहां ये स्त्री के साथ बलात्कार की बात करते हैं और उसे सीधे धर्म से जोड़ देते हैं... मतलब अगर धर्म से देवी पूजा खत्म की जाए तो शायद बलात्कार के आकड़े कम हो जाएंगे.. मग़र कोई इनसे पूछे कि जिस देश के मंच पर खड़े होकर देवी पूजा और बलात्कार को जोड़ रहे हैं, उस देश में तो स्त्री रूपी देवी की पूजा नहीं होती फिर वहाँ छेड़छाड़, बलात्कार के आकड़े क्यू ज्यादा है? क्या वाकई धर्म से बलात्कार का कोई संबद्ध है..? नहीं है तो स्त्री अपराध, बलात्कार को अलग से भी कविता सुनाया जा सकता है? उसे धर्म से जोड़ने की क्या जरूरत आन पड़ी? आपको पता है कि ऐसी जरूरत थी और बहुत बड़ी.. पहली तो.. विवादस्पद बोल देने से जल्दी सस्ती प्रसिद्धि मिल जाती है और दूसरी कि उनके ऑडियंस हिन्दू धर्म को लेकर कुंठित है और ऐसे मज़ाक उड़ाने में आत्मिक संतुष्टि मिलती है. पहले भी कई बार लिख चुकी है और फिर लिख रही हूँ कि हिन्दू धर्म के अलावा भी अन्य धर्मों में मंच पर मज़ाक उड़ाने लायक तमाम बातेँ है मग़र उसके बाद कलाकार को जीवित नहीं छोड़ा जाएगा... इसलिए प्रगतिशील लेखक, कवि ऐसी जुर्रत कर ही नहीं पाते केवल और केवल हिन्दू धर्म भी ऐसे भद्दे मज़ाक की सहूलियत देता है.
बात अगर वाकई स्त्री सम्मान और अपराध खत्म करने की होती तो क्या कंगना की अर्ध नग्न फोटो डालकर भद्दे भद्दे पोस्ट भी किए जाते हैं? अश्लील कार्टून भी बनाए जाते... उसकी बातों का वैचारिक स्तर पर ही विरोध हो सकता है. जो भी महान कविवर का साथ दे रहे हैं और साफ़ साफ़ कह रहे हैं कि वास्तविक स्थिति का चित्रण किया है.. वो कह रहे हैं कि सच ही तो बोला है कि जब स्त्री को देवी रूप में पूजा जाता है तो रात में बलात्कार क्यू?.. इन्हीं में से आधे से ज्यादा लोग कंगना का ऑनलाइन बलात्कार लिख कर, फोटो रोज डालते हैं.. किसी महिला से खफा होते हैं तो ऑनलाइन शोषण शुरू कर देते हैं....असल में ऐसे दोगलो को मानसिक इलाज की जरूरत है. स्त्री की कोई बात नागवार गुजरे तो उस पर यौन हमले, भद्दी बातेँ या व्यक्तिगत रूप से परेशान करने तक ही पुरुष वर्ग सोच पाता है और वज़ह भी उसका सामाजिक परिवेश है. उसे इस पुरुष प्रधान समाज ने यही सिखाया है कि स्त्री की बात बुरी लगे तो उसका चरित्र हनन कर दो. अकेली दिखे तो उसे फ्लर्ट करने की कोशिश करो, सम्भव हो तो उसे बिस्तर तक ले जाओ. ऐसा करते हुए भी कोई मंच मिल जाने पर स्त्री अत्याचार, अपराध, बलात्कार के खिलाफ बोलकर वाह वाही लूटते है. जितने भी लोग वॉशिंग्टन में कॉमेडी शो में मौजूद थे और जितने भी लोगों ने ट्विटर, Facebook पर कविवर के Favour मे लिखा, बस अगर केवल उतने ही लोग स्त्री सम्मान करने लगे तो स्त्री अपराध के आकडों में बड़ी गिरावट आएगी. हमें मंच पर खड़े होकर केवल वाहवाही लूटने के बजाय व्यावहारिक रूप से अपराध को रोकने की जरूरत है क्यू कि सवाल हमारी ही अपनी बेटियों का है.
No comments:
Post a Comment