मनुष्य एक नायाब तोहफा है, परमात्मा का इस धरती पर। उसे सर्वसमर्थ और बुद्धिमान बना के भेजा है, ताकि वो उत्तम सृष्टि की रचना कर सकें। मनुष्य (स्त्री और पुरुष) को परमात्मा ने सारे गुणो से नवाजा हैं-- प्रेम, त्याग, तपस्या, समर्पण, जनकल्याण और इन सब के साथ ही अहंकार, स्वार्थ, लोभ, मोह। ताकि इन सबसे एक उत्तम सृष्टि की रचना कर सकें, लेकिन अब परमात्मा प्रदत्त सृष्टि में मनुष्य स्वार्थी हो चला है, वो सभी गुणों को अपने हित के लिए ही साध रहा हैं।
अब मनुष्य एक रोग हो चला है, अब जरुरत आन पड़ी इस रोग को पहचानने और इसके चिकित्सा की। इस "मनुष्य" नामक रोग दो तरीके से हो रहा हैं--1-- बाहरी 2--- आतंरिक। औषधि से हम बाहरी रोग का निवारण कर रहे हैं और नित नए उपाय भी खोजे जा रहे हैं। आतंरिक रोग का निवारण "ध्यान" है और निशुल्क भी। समाज में फैल रहा जहर इस गंभीर बीमारी का घोतक है। उस परमात्मा को याद करे कुछ क्षण, एक अद्भुत, अलौकिक आनंद की प्राप्ति होगी, ये स्वार्थ, लोभ, मोह, छल, अहंकार का स्वत हो जायेगा और हम स्व की प्राप्ति करेंगे, ये"स्व" परहित की भावना लिए हुए होगा। तो चले आधात्मिक शांति और आतंरिक रोग समाप्त करने के लिए ध्यान की ओर.....
##चलो ध्यान की और##
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