@ आखिर प्रदर्शन पर पिटाई क्यू?
@. क्या ये गैर संवैधानिक है?
आइए इस संबंध में कानून देखते हैं..?
नागरिकों का अधिकार - -
संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों में स्वतंत्रता का अधिकार के अंतर्गत - -
"अनुच्छेद 19 (ब) कहता है कि नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से और बिना हथियारों के सम्मेलन करने और जुलूस निकालने का अधिकार है l जो सार्वजानिक सुरक्षा और शांति व्यवस्था के हित की मांग को लेकर हो l"
@@ अगर पिछले सभी प्रदर्शन पर नज़र डाली जाए तो किसी न किसी देश हित/ नागरिक हित की मांग को लेकर ही था l
प्रशासन/पुलिस बल को मिले अधिकार
वही पुलिस द्वारा शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए IPC की धारा 141 लगायी जा सकती है l
" धारा 141 तभी लगायी जाती है जब विधि विरुद्ध सभा (unlawfull assembly) का अंदेशा हो l जहां पांच या उससे अधिक लोग इकट्ठा हो रहे हो (या कोई प्रदर्शन हो रहा हो जो विधि विरुद्ध हो)"
"सीआरपीसी की धारा 129 में यह अधिकार है कि किसी विधि विरुद्ध जमाव या पांच से अधिक व्यक्तियों के जमाव को जिससे लोक शांति को खतरा है तितर बितर होने का समादेश दे सकता है उसे लाठीचार्ज करने के लिए उच्चाधिकारियों से आदेश लेना पड़ेगा। बिना आदेश लाठी चार्ज गैर कानूनी होगा l "
वही धारा 130 के अनुसार" अगर किसी विधि विरुद्ध जमाव है तो लोक सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि उसको तितर-बितर किया जाए तो भी शर्त यह है कि उस समय उच्चतर पंक्ति का कार्यपालक मजिस्ट्रेट वहां उपस्थित हो। उसी समय सशस्त्र बल द्वारा लोगों को तितर-बितर किया जा सकता है। ऐसे किसी अधिकारी से जो सशस्त्र बल के व्यक्तियों की किसी टुकड़ी का समादेशन कर रहा है उससे अपेक्षा कर सकता है कि वह अपने समादेशाधीन सशस्त्र बल की मदद से तितर-बितर करे या विधि के अनुसार दण्ड देने के लिए गिरफ्तार या परिरुद्ध करने की अपेक्षा भी कर सकता है। किंतु ऐसे बल प्रयोग में किसी भी व्यक्ति के शरीर एवं संपत्ति का सिर्फ उतना ही नुकसान पहुंचाएगा जितना उस जमाव को तितर-बितर करने में आवश्यक हो।"
जबकि इसका स्पष्ट उल्लंघन सभी प्रदर्शनों में देखा जा रहा है.. लाठी चार्ज के दौरान बुरी तरह से प्रदर्शनकारी को जख्मी किया जा रहा है और सीधे वार सर पर ही किया जा रहा है.. और पुरुष पुलिस बल द्वारा महिलाओं को बाल पकड़ कर घसीटना और डंडों से पीटना ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाता है जहां उद्देश्य किसी भी प्रदर्शन को पूरी तरह से कुचलना होता था l
वही शहर के हालात बिगड़ने के अंदेशे पर धारा 144 भी लगायी जा सकती है
"सीआरपीसी के तहत आने वाली धारा-144 शांति व्यवस्था कायम करने के लिए लगाई जाती है. इस धारा को लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट यानी जिलाधिकारी एक नोटिफिकेशन जारी करता है. और जिस जगह भी यह धारा लगाई जाती है, वहां चार या उससे ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते हैं. इस धारा को लागू किए जाने के बाद उस स्थान पर हथियारों के लाने ले जाने पर भी रोक लगा दी जाती है. धारा-144 का उल्लंघन करने वाले या इस धारा का पालन नहीं करने वाले व्यक्ति को पुलिस गिरफ्तार कर सकती है. उस व्यक्ति की गिरफ्तारी धारा-107 या फिर धारा-151 के तहत की जा सकती है. इस धारा का उल्लंघन करने वाले या पालन नहीं करने के आरोपी को एक साल कैद की सजा भी हो सकती है. वैसे यह एक जमानती अपराध है, इसमें जमानत हो जाती है l"
मगर इन सभी धाराओ को लागू करने का उद्देश्य गैर राजनीतिक हो और संविधान के मूल अधिकारों की अवहेलना भी न हो रही हो l
भारतीय संविधान हमें अपनी आवाज़ उठाने और प्रदर्शन का अधिकार तो देता है, मगर ये प्रदर्शन विधि सम्मत नहीं है और जहां शांति भंग होने की संभावना है वहां पुलिस को भी उचित तरीके से उसे तितर बितर करने और जरूरत पड़ने पर उचित बल प्रयोग का अधिकार देता है न कि पीटने का और सर फोड़ने का जैसा कि उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के प्रदर्शन में वायरल हो रही Vedio में देखा जा रहा है l
ये नितांत सोचनीय तथ्य है कि देश किस दिशा में आगे बढ़ रहा है
.. प्रदर्शन को उग्रता से दबाने के चलते अब लोग भी हिंसक हो कर प्रदर्शन और तोड़ फोड़ करते हैं.. इस तरह से तो समाज एक विस्फोटक स्थिति में आ जाएगा.. जबकि कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका बनाने और संविधान को बनाने का मकसद ही एक स्वस्थ्य और सुरक्षित समाज का निर्माण करना था लेकिन अभी की व्यवस्था से तो ब्रिटिशवादी शासन की ही याद आती है और लगता है कि हम प्रजातंत्र से दूर हो रहे हैं.. यहां शासन, प्रशासन और नागरिक सभी का ये कर्तव्य बनता है कि देश में संविधान और उसकी मूल आत्मा को जिंदा रखा जाए और अपने व्यक्तिगत हित या इच्छा के लिए प्रजातांत्रिक ढांचे को नुकसान न पहुंचाया जाए l
रीटा शर्मा
सोशल एक्टिविस्ट
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