गाँव में रास्ते से गुजर रही थी मंज़िल की तरफ। आज प्रोग्राम था हमारा प्राइमरी स्कूल में। तभी अचानक चलते चलते पाव रुक गए, एक ग्रामीण महिला ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी, क्योंकि उसका पति उसे हाथों औऱ पैरों से मार रहा था और गलियां भी दे रहा था, वो स्त्री भी अपने पति के माँ, बहनों को गाली दे रही थी। शायद कोई पारिवारिक झगड़ा था। लोग इकट्ठा हो रहा था। मेरा मन कर रहा था जाकर कहू कि मार क्यों रहे हो, कोई दिक्कत है तो आपस में बातें करो। तभी उसने पास से एक हरी डंडी उठाकर और ज़ोर जोर से मारने लगा, सभी तमाशा देख रहे थे कोई कुछ नहीं कह रहा था। महिला पर इस तरह से सरेआम हिंसा और हमारा कानून कहाँ किन किताबों में छुपा हुआ हैं, कौन करेगा ऐसे लोगों के साथ इंसाफ़। उस स्त्री को तो शायद ये भी पता नहीं था कि महिलाओं पर हिंसा करना कानूनन अपराध हैं। तभी एक सज्जन बोले तो दुर्जन वृद्ध बाइक से निकले, कुछ देर तमाशा देखा फिर बोले "डंडे से नहीं हाथों और पैरों से ही मारो"। मैंने वहां से हटना उचित समझा, क्योकि कई बार ऐसे मौके पर विरोध कर, पुलिस बुलाकर मैं बहुत चर्चित हो चुकी हूँ। मैं अपने गंतव्य की तरफ बढ़ गयी। पर सोचती रही कि ऐसी घरेलू हिंसा को बस महिलाओ को जागरूक करके, कानून बताकर ख़त्म की जा सकती हैं।
स्त्री माँ हैं, पालिका हैं
गृहलक्ष्मी हैं, बेटी है, बहन है।
फिर ये दुर्दशा क्यों, भूल गयी हो क्या तुम
ऐ नारी अपना ये रूप, सबला से अबला कैसे।
तोड़ो समाज की बेड़ियाँ, बनाओ खुद को सशक्त इतना कि हो नारी होने पर अभिमान।।
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