जीवनसाथी
दोनों अपनी ही अपनी बोले जा रहे थे, कोई सुनने को ना तैयार था, झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था, अचानक पति बोला-" तलाक दे दो", पत्नी ने कहा सही कह कह रहे हो मैं भी यही सोच रही थी। फिर दोनों अपने अपने कमरें में चले गए। रीना बेटे के पास बैठ गयी और सोचने लगी कि अब तो मैं अच्छा कमाने लगी हूँ, अलग होने पर कोई दिक्कत नहीं आएगी, बस अब बर्दाश्त नहीं करुँगी। सारा दिन घर, ऑफिस, बच्चा और ऊपर से रिश्तेदार, सब कुछ निभाते निभाते मशीन बन गयी हूँ, फिर भी पति के पास 5 मिनट नहीं है मेरे लिए और ना प्यार के शब्द। एक वो समय था कि बस प्यार ही प्यार, वक्त ही वक्त समय भी कितना जल्दी बदलता हैं। अचानक बेटा उठ बैठा--- अरे! माँ रो क्यों रही हो? पापा ने फिर कुछ कहा क्या? अभी बात करता हूँ, उठने लगा.....। रीना हाथ पकड़ कर बैठाते हुए बेटा कुछ नहीं हुआ.... हँसते हुए । फिर सोचने लगी कि कृष्णा समय से पहले ही बड़ा हो रहा है, उसके मानसिक विकास पर असर पड़ेगा। जल्दी ही कोई फैसला लेगी।
उधर शांतनु सोच रहा था कि अब उसे रोज रोज की किच किच से मुक्ति चाहिए कुछ भी हो। सारा दिन ऑफिस की टे न्शन, टारगेट, बॉस की फटकार और फिर घर आते ही-- ये करो वो करो, मार्केट जाऊ, ये भी कोई जिंदगी हैं कही सुकुन नहीं। अब तलाक ही हल हैं इस कलह से मुक्ति का, बस खर्च ही उठाना पड़ेगा, अब तो अच्छा कमाने लगा हूँ।
नन्हा सा बच्चा कृष्णा सोने का बहाना करते हुए रो रहा था क्योंकि उसने माँ पापा की बात सुन ली थी। अगर माँ पापा अलग होते हैं तो फिर वो माँ के पास.... या पापा....। एक को छोड़ना, एक के साथ रहना... नहीं नहीं मुझे दोनों चाहिए। क्या माँ पापा मेरे लिए मैनेज नहीं कर सकते है? मुझे माँ पापा का पैसा, गिफ्ट नहीं चाहिए, प्यार चाहिए......।
रीता शर्मा
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