Sunday, October 8, 2017

"साई अस्पताल के कारनामे, गुडम्बा थाने ने अगले दिन आने को कहकर टाला और कहा--"मोदी से बात करा दो।"

"विशेष संवाददाता लखनऊ"


लगभग 1 महीने पहले हुए बेहोशी के बाद ऑपरेशन और 9 दिन ICU और 20 दिन कोमा  में रहने की बात कहकर "साई हॉस्पिटल, कुर्सी रोड लखनऊ ने लगभग 3 लाख का बिल बनाया और पूरा पैसा न चुका पाने की असमर्थता के कारण परिवार वालों को बंधक बनाया गया। इस पर उक्त पीड़ित परिवार ने मीडिया को खबर दी, इस खबर को छापने के लिए 30,000 की मांग की और 3500 रूपये मौके पर ही लेकर एक प्रतिष्ठित अख़बार में खबर छाप दी। खबर का कोई असर न हुआ।
इधर पीड़ित किसी तरह से 2 लाख का इंतज़ाम कर अस्पताल को देकर आगे पैसे की बात कहता है। पूरी लिखा पढ़ी के बाद उन्हें मुक्त कर दिया जाता है। इस बीच 100 नंबर से आई पुलिस भी बिल चुकाने की बात कह कर मौके से चली जाती है। हाँ इन हंगामों के बीच उन्होंने समय से पहले जन्मे बच्चे को जरूर घर भेज दिया था। अब उक्त मीडिया भी अपने पैसे की वसूली का दबाव डालने लगा।
बहुत परेशान होकर पीड़ित परिवार ने एक समाज सेवी संस्था को ये बात बताई। तो संस्था ने तुरंत मामले को संज्ञान में लेते हुए उन्हें तुरंत एसएसपी ऑफिस लेकर गयी, जहाँ एसएसपी की गैर मौजूदगी में एसपी ग्रामीण डॉ सतीश ने मामले को सुनकर सम्बंधित थाने में फ़ोन कर कार्यवाही के निर्देश दिए।
लेकिन जब पीड़ित पक्ष थाने पहुँचता है तो उनसे पेपर लेकर जांच के बाद कार्यवाही की बात कहकर वापस कर दिया गया। अगले सारे दिन उक्त पीड़ित मरीज को KGMU लखनऊ ट्रामा सेण्टर में डॉक्टर्स के अनुसार स्त्री रोग, न्यूरो, मेडिसिन, मानसिक रोग सभी जगह दिखाया गया।
सभी डॉक्टर्स ने किसी भी बीमारी से इंकार किया और कहा शायद बुखार और कमज़ोरी से बेहोश हुई थी उक्त पीड़ित परिवार से सभी विभाग में इलाज़ और checkup के पेपर्स मांगे जो कि "साई हॉस्पिटल" ने दिए ही नहीं। KGMU का कहना है कि जब तक उक्त मरीज़ की exmine रिपोर्ट और टेस्ट नहीं दिखाए नहीं जायेंगे, वो कुछ कह नहीं पाएंगे फिलहाल कोई बीमारी नहीं दिख रही है सिर्फ कमजोरी और बुखार के।
"एक बड़ा सवाल ये उठता है कि जैसा कि उक्त हॉस्पिटल ने लड़की को कोमा में जाने की बात और बच्चे के खतरे की बात कहकर समय से पहले ऑपरेशन कर दिया। 9 दिन ICU में और फिर जनरल वार्ड में शिफ्ट किया और साथ ही 20 दिन कोमा में रहने की बात कही।
क्या इन सभी बातों का आपस में कोई तालमेल बैठ रहा है?
क्या कोई कोमा में 20 दिन रहकर कोई एकदम स्वस्थ हो जाता है?
क्या कोमा से बाहर आई पीड़ित माँ अपने बच्चे को दूध पिला सकती है?
ऐसे अनगिनत सवाल उठ रहे है साई हॉस्पिटल पर, लेकिन जवाब कौन मागेगा?

एसपी ग्रामीण निर्देश के बावजूद कार्यवाही न होने पर अगले दिन फिर से उन्हें अवगत कराया जाता है और फिर फ़ोन करके सम्बंधित थाने को निर्देश दे रहे है, उनके निर्देश के अगले दिन कुछ टाइम निकाल कर फिर पीड़ित गुडम्बा थाने जाता है, जहाँ फिर से उन्हें अगले दिन आने की बात कही जाती है, वो बीमार बीबी और बच्चे की दुहाई भी देते हैं मगर कोई सुनता नहीं।
इस पर पीड़ित पक्ष फिर से संस्था को फ़ोन करता है। संस्था की बात गुडम्बा SHO से बात करती है तो उनका वही जवाब होता है कि अगले दिन आये, पीड़ित की मज़बूरी बताने पर भी वो कहते है कल आ जाए, ये पूछने पर कि क्या ये उचित है? क्या हम इसकी खबर मीडिया को दे..SHO कहते है.."बिल्कुल दे दे आप और फ़ोन काट देते है।"
एक बार फिर से संस्था एसपी ग्रामीण से बात करती है इसके बावजूद SHO गुडम्बा कोई भी कार्यवाही नहीं करते हैं और साफ़ साफ़ कहते हैं कि फ़ाइल चौकी पर है, कल तक आएगी।

उक्त पीड़ित पक्ष से मज़ाक बनाते हुए कहा जाता है ..."मोदी से बात करा दे।"

अब यहाँ कई सवाल उठ रहे है--
1--क्या पुलिस अस्पताल को बचा रही है?

2-- पीड़ित की फ़ाइल चौकी पर क्या कर रही है, केस तो थाने में दर्ज होना है और साथ ही चौकी क्या इतनी दूर थी कि फ़ाइल मगाई नहीं जा सकती थी? उक्त परिवार की नाज़ुक स्थिति क्यों नहीं दिखी 24 घंटे काम करने वाले वीर पुलिस के जवान को?

3-- सबसे अहम बात क्या ये SHO और SI एक एसपी और एसएसपी से बड़े होते हैं? जब ये अपने सीनियर को बातों को झुठला रहे हैं तो पीड़ित की क्या सुनते होंगे? इससे पहले भी कई मामले प्रकाश में आये है जहाँ पर सीनियर्स की बात नहीं फॉलो की गयी। जब खुद पुलिस विभाग में इतनी अनुशासन हीनता है तो क्या होगा समाज का? क्या हम करें एक अपराध मुक्त समाज की कल्पना??

No comments:

Post a Comment