Friday, October 27, 2017

पुलिस, सरकार और दम तोड़ता कानून


वर्तमान समय में जगह जगह हो रहे प्रदर्शन और उस पर रोक के लिए पुलिस की बर्बरता देख कर अनायास ही मन कह उठता है कि क्या अब संविधान के अस्तित्व को चुनौती दी जानी लगी है? क्या हमारे मौलिक अधिकार वाकई खत्म कर दिए जायेंगे? क्या प्रदर्शन से निपटने का एक ही तरीका है-लाठी चार्ज? क्या लाठी चार्ज का मतलब वाकई प्रदर्शकारियों पर लाठी बरसाना होता है? या फिर मकसद भीड़ को तितर बितर करना होता है? एक और सवाल जेहन में आता है कि इन दिनों प्रदर्शन इतने ज्यादा क्यों हो रहे हैं, क्या लोगों के अधिकार छीने जा रहे है? लोग इतना असुरक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं कि बार बार इकट्ठा होकर प्रदर्शन पर आ रहे हैं?
 बात यहाँ तक आ गयी है कि अब असामाजिक तत्वों के खिलाफ न बोलने के लिए अध्यादेश लाने की तैयारी की जाने लगी है। इसका साफ़ साफ़ एक ही मतलब है कि सरकार भी अपने को असुरक्षित महसूस कर रही है, इसलिए ऐसा कानून लाना चाहती है। मगर क्या कोई भी अब तक जनता की आवाज़ दबा पाया है? इतिहास पलट कर देखा जाए तो पता चल जाता है कि आवाज़ दबाने की कोशिश पर आवाज़ और मुखर हुई, जीत आखिरकार जनता की ही हुई है।


अब वाकई ये जरुरत आ गयी है कि सरकार में मौजूदा सभी निर्वाचित पदाधिकारी और पुलिस पर्सनेल को नियम, कानून और मानवता का एक कोर्स अनिवार्य कर दिया जाए और जो इसे पास करें, वही व्यक्ति कार्य करने के योग्य समझा जाए।
इस तरह हर रोज की मार-पीट और गाली गलौज को हम जिस तरह से मीडिया पर प्रमुखता से परोस रहे हैं, उससे हमारी अन्तर्राष्टीय साख गिर रही हैं जिसे हम आंतरिक कलह के बीच भूल चुके हैं। 
भ्रष्ट देशों में श्रेष्ठ, भुखमरी में आगे...ये आंकड़े किस आधार पर और कहाँ से लिए गए इसे पूछने के लिए शायद किसी भी सरकारी अधिकारी को फुरसत नहीं। जाहिर है कि इसका आधार भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया ही है, जहाँ के servy ही आधार बना कर ऐसी जगहों पर भारत को विराजा जा रहा है।
कहीं पर सरकार द्वारा पुलिस को नियंत्रित करने की कोशिश( विधायकोंको सम्मान और चाय नाश्ता), कहीं पर अधिकारीयों को ज्यादा सुरक्षित करने की कोशिश ( राजस्थान में अध्यादेश लाने की कोशिश),  देश की विरासत को नकारना, समाज का विभिन्न वर्ग और समूह में बट जाना... ये सभी बातें एक असुरक्षित लोकतंत्र को दर्शाता है जहाँ हर कोई अपनी सुरक्षा को लेकर बैचैन है।


हर दिन हो रहे गंभीर अपराध और उस पर नियंत्रण न कर पाना मतलब कानून व्यवस्था का बिगड़ना ही है। जो शक्ति और ऊर्जा जनता को दबाने के लिए खर्च की गयी अगर वही अपराध नियंत्रण में खर्च की जाए वो निश्चित तौर पर पुलिस की इमेज में सुधार होगा। आँगन वाड़ी कार्यकर्ताओ पर जिस तरह से लाठी चार्ज और उन्हें बाल से नोचा, घसीटा गया...देख कर ही रोंगटे खड़ा करता है कि ऐसे आदेश किसके करकलमों से निकले और किन्होंने इनका पालन किया? फिर ऐसी स्थिति में आप जन सहयोग की अपेक्षा करें तो जनभावना कैसी होगी? क्या इनसे निपटने का कोई और तरीका नहीं था? भीड़ को हटाने के लिए क्या मार पीट जरुरी थी? क्या पुलिस के पास हर किसी पर बल प्रयोग के अधिकार है? और सबसे हास्यपद स्थिति ये कि पुलिस द्वारा सरकारी कामों में बाधा पहुचाने और विभिन्न धाराओं में मुक़दमा महिलाओं पर दर्ज किया गया है, तो जायज सवाल है कि पुलिस पर भी मुकदमा तुरंत दर्ज हो...क्योंकि मेडिकल के साथ साथ फोटोज खुद ही बहुत कुछ सिद्ध कर रही है।

 किसानों द्वारा भी बार बार आंदोलन ये बता रहा है कि उनकी स्थिति भी दयनीय है। अभी पिछले महीनों किसानों द्वारा मल, मूत्र सेवन के बाद अब उनका जमीन दोज होना उनकी दयनीय स्थिति को खुद ही बयां कर रहा है।

कर्ज माफ़ी के नाम पर पैसे और कुछ रुपये माफ़ करने की सरकारी काम काज के लागत की गणना की जाए तो हम सिर्फ अपना सर ही पीट सकते है।



इन सभी बिगड़ती व्यवस्था और बिखरते कानून पर दोषी किसे माना जाए..सरकार या  जिम्मेदार कर्मचारी?
 जाहिर है जब तक इस पर गहन विचार नहीं किया जायेगा, समस्या नहीं खत्म हो सकती। कही पर ऊपर का प्रेशर, कही पर अनदेखी, कही पर अपराधियों का साथ देना और कही पर पैसे की भूख ही अव्यवस्था फैलाती है जिसे दूर करके ही उत्तम लोकतंत्र की प्राप्ति हो सकती है। इसके लिए एक ईमानदार कोशिश और मज़बूत राजनितिक और प्रशासनिक इच्छा शक्ति की जरुरत है।




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