Saturday, October 28, 2017

"लड़का सिखाओ, समाज बनाओ"


जिस तरह से निरंतर स्त्री अत्याचार और बाल अत्याचार की ख़बरें आ रही है, उससे पता चलता है कि हम निरंतर सामाजिक और नैतिक पतन की ओर जा रहे हैं।
हर दिन छेड़छाड़, बलात्कार, हत्या जैसी खबरों से अख़बार पटा रहता है तो स्वाभाविक रूप से हम सोचने को विवश हो जाते हैं कि क्या अब पुरुष विश्वास के काबिल नहीं रहे। चाहे घर हो या बाहर दो जोड़ी हाथ और आँखे खाने को तत्पर दिखती है।
लगातार स्त्रियों पर हो रहे हमले और पुरुष प्रधान समाज का अपराधीकरण ये सोचने को विवश करता है कि "क्या समाज का वाकई नैतिक पतन हो चुका है और इस तरह से पुरुष जाति अपराधी बनती रही तो फिर एक दिन अपराधियों का ही समाज बन कर रह जायेगे।"
अगर इस तरह तीव्र गति से अपराध बढ़ता रहा तो इसकी जद में छोटे बच्चे आ जायेंगे या कहे आ चुके हैं। अगर हम बात करें सख्त नियम, कानून और उसके पालन की। तो हो गए अपराध से निपटारा और अपराधी को सज़ा तो मिल जाती है लेकिन इससे अपराध पर अंकुश नहीं लगता। तो फिर सवाल उठता है कि ऐसा क्या किया जाए कि अपराध रुक जाए?
संस्कार... संस्कार ही वो रास्ता है जिससे हम पुरुष समाज का अपराधीकरण रोक सकें।


माता पिता का दायित्व बन जाता है कि छोटे से बच्चों में संस्कार डाला जाए। क्या करना है और क्या नहीं ये सिखाने की पहल बेटी के साथ बेटों को भी करें। किसी को चोट न पहुचना, दूसरों की इज़्ज़त करना, अकारण किसी को कुछ न कहना, राह चलते फब्तियां न कसना, अगर राह चलते कोई भी तकलीफ में दिखे तो मदद करना....जैसी बातें सिखाकर हम आने पीढ़ी को अपराध और हिंसा से निश्चय ही दूर कर पाएंगे।
अभी तक ये सारी बातें सिर्फ बेटियों को ही सिखाते थे, मगर दोनों को साथ बैठाकर ऐसी बातों पर चर्चा करें। साथ ही अब तक बेटों में डाला जाने वाला बहादुरी का गुण बेटियों में भी डाला जाए। समाज में हो रहे अपराध पर बच्चों के साथ स्वस्थ चर्चा की जाए और साथ ही उसके कारण और दुष्परिणाम भी बताया जाए। बेटे, बेटियों को संवेदनशील बनाया जाए ।
 अहं...जो बहुत सारे अपराध और समस्याओं की वजह है, इसे पनपने से रोका जाए। अहं पर चोट पड़ने की वजह से ही क्रोध में अनियंत्रित होकर बीमार पुरुष वर्ग एसिड अटैक जैसे जघन्य कृत्य को अंजाम दे देते हैं बिना ये कल्पना किये कि छोटी सी बात के चलते एक निर्दोष लड़की एक आग में जिंदगी भर जलेगी।



बलात्कार, बाल हिंसा, हत्या, मार पीट... आदि व्यक्ति के असंवेदनशील होने को ही दर्शाते है। अगर हम किसी के पीड़ा का अहसास करना सीख जाए तो दूसरों को पीड़ा दे ही नहीं सकते।
तो बस शुरुआत इसी की करनी है कि सही-गलत, अच्छे-बुरे की पहचान बेटों को कराये साथ ही बेटियों को आत्म रक्षा के गुण सिखाये।



उन्हें दूसरों की पीड़ा का अहसास करना सिखाये और इस तरह से एक सुरक्षित समाज का निर्माण करें।


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