अपनी पहचान ढूंढती एक स्त्री,
हमेशा सबकी खुशी में खुश होती
आसमान में उड़ जाने को भी मचलती स्त्री,
कभी डांट डपट कर; कभी घर परिवार का हवाला देकर,
बार बार चौखट के अंदर आती स्त्री,
गर इन सब बाधाओं को पार करके,
घर द्वारे को लांघ के; कुछ पहचान बना पाती है तब भी सहकर्मियों की निगाह में खटती स्त्री
अवसर पाकर छली भी जाती,
जब भी इन पुरुषों को किसी को दिखाना होता नीचा,
तब भी गालियों से नवाजी जाती स्त्री ,
कभी किसी का माल बनकर,
तरक्की के लिए सप्लाई की जाती स्त्री ................................
क्या कभी स्त्री ने सवाल किया इन मूढ़ मालिकों से?
क्यू स्त्री सहारा बने उनकी तरक्की का?
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