अच्छा कम बुरा ज्यादा हैं,
हम जितना हक अधिकार की मांगें करते हैं
उतना ही डाका पड़ जाता है,
ये है कौन जो नज़रे जमा कर बैठा है?
ये है कौन.? जो बात बात पर डंडे चलवाता है?
कानून के रखवालों के हाथ ही
कानून को शर्मसार करवाता है,
शांति की एक सभा में कुछ उदंडो को बुलवाता है
वो आते हैं, कुछ नारे लगाते हैं, कुछ हुड़दंग मचाते है,
कभी आग लगवाते है तो कभी कुछ पत्थर चलवाते है
और फिर शुरू हो जाता है दमन का खेल,
हम नहीं है उस भीड़ के साथ जो हर वक़्त
भूखे भेड़िये सी मौके पर नजरे जमाए रहता है,
फिर भी थाने हमें खींचकर उन्हें छोड़ दिया जाता है
अच्छा, आखिर ये है कौन जो हमें नाच नचा रहा है,
हम क्यू नहीं इनकी पहचान करते हैं
इन्हें भीड़ से अलग करके, आईना दिखाते हैं
क्यू नहीं हम कोशिशों से अच्छा समाज बनाते हैं..
मन बड़ा व्याकुल सा है
अच्छा कम बुरा ज्यादा हैं l
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रीटा शर्मा
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