Monday, March 20, 2017

सरपट दौड़ती जिंदगी



आजकल के भागमभाग समय में किसी के पास इतना वक्त ही नहीं रहा कि दो पल सुकून की साँस ले सके। पैसा कमाने की होड़ ने खुद को खुद से ही अंजान कर दिया है। जिसके चलते छोटी उम्र में ही लोग तनाव, अवसाद और अनेक रोगों के शिकार हो रहे हैं। परिवार में ही खुद सदस्यों के पास इतना वक्त नहीं कि वे दो घड़ी बैठकर अपनी परेशानी कह सके।
हम पूरी तरह से टेक्नोलॉजी बेस्ड हो गए हैं। आपाधापी भरी जिंदगी में हमारा खाना भी डिब्बा बंद हो चला है। बच्चे इसी माहौल में पल-बढ़ रहे हैं, पैक्ड बंद और दो मिनट में तैयार होने वाले फ़ूड के वो इतने आदी हो चले हैं कि अब उन्हें घर का बना ताजा, शुद्ध और पौष्टिक आहार पसंद नहीं आता और माता-पिता भी उन्हें ये सब खिलाना अपना स्टेटस सिंबल समझते हैं।
हमारे पास ये सोचने का भी वक्त नहीं हैं कि हम किस तरफ बढ़ रहे हैं ? आगे बच्चों का भविष्य क्या होगा ? हम उन्हें कान्वेंट एजुकेशन, महँगे कपड़े, पश्चिमी सभ्यता वाले डिब्बा बंद विदेशी खाना और तमाम अनावश्यक जरूरते तो पूरी कर रहे हैं, मगर क्या हम उन्हें जीवन मूल्यों, संस्कार, सभ्यता, अपनी संस्कृति का ज्ञान दे रहे है? ...नहीं क्योकि हमारे पास खर्च करने को पैसे तो है लेकिन वक्त नहीं। ये मूल्य विहीन समाज हमें कहाँ ले जायेगा...ये सोचने की फुर्सत भला किसे है?
हम रिश्तों की परिभाषा भूलते जा रहे हैं, फिर संवेदनहीन व्यक्तियों से समाज का क्या होगा? जाहिर है अपराध बढ़ेगा और नैतिक मूल्यों का ह्रास होगा।
एकल परिवार के बढ़ते चलन से भी पारिवारिक और नैतिक मूल्यों का अभाव हो चला है। मुहफाड़ महँगाई के चलते हम ना चाहते हुए भी अलग और अकेले रहने को मज़बूर हो चले हैं।
पहले दादा-दादी, नाना-नानी के द्वारा कहानी के माध्यम से बच्चे बहुत कुछ सीख जाते थे और ऐसे उनकी लाड़ दुलार के साथ अच्छी परवरिश हो जाती थी। अब जिंदगी की आपाधापी में ये सब कहीं खो सा गया है।
हम बच्चों को सही और गलत की पहचान कराकर भविष्य में होने वाले अपराध कम कर सकते हैं। आंकड़े बताते हैं कि इधर किशोर अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हुई है।
एक उत्तम और अपराध विहीन समाज बनाने की राह में हमें कुछ तो समय देना होगा, बचाना होगा नैतिक और सामाजिक मूल्यों को, पिरोना होगा रिश्तों की मोती को। आज बच्चों को दिए गए अच्छे संस्कार ही कल उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनायेगा और इस तरह एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकेगा।

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