महिला अपराधों की संख्या में दिन प्रति दिन इजाफा
होता जा रहा है। रेप, मर्डर एक आम सी बात हो चली है .. हत्या वो नृशंस तरीके से .. कुचल कर, जलाकर। महिला अपराध ज्यादातर पुरूषों द्वारा ही किए जाते रहे हैं और घरेलू हिंसा के मामले में महिला पर महिला द्वारा अत्याचार देखने को मिलता है।
मगर बीते दिन एक हैरान करने वाला वाकया चंडीगढ़ की एक यूनिवर्सिटी से सामने आया जिसमें एक छात्रा द्वारा अपने ही पीजी में रह रही अन्य छात्राओं का कपडे बदलते हुए, नहाते हुए वीडियो बनाने के बाद अपने एक दोस्त को भेजती रही और उस लड़के ने उन विडियोज को वायरल कर दिया। मामला सामने आते ही वीडियो में दिख रही लडकियों ने कथित तौर पर आत्महत्या की कोशिश की और हॉस्टल में हंगामा होने, ल़डकियों की तबियत बिगड़ने पर पुलिस, एंबुलेंस बुलाई गई। इस मामले में शामिल लड़के, लडक़ी को गिरफ्तार कर लिया गया और पुलिस प्रशासन द्वारा सख्ती से कार्यवाही की बात कहीं जा रही है।
यहां गंभीर विचारणीय प्रश्न जो सामने है वो ये कि " आखिर उक्त छात्रा का अन्य लडकियों का पॉर्न वीडियो बनाने का मकसद क्या था? उसे इसकी प्रेरणा कहां से मिली? वीडियो बनाते और उसे दूसरी जगह भेजते वक्त उसे कानून/ पुलिस का डर क्यूं नही सताया?"
बीते कई सालों से देखा जा रहा है कि गंभीर महिला अपराध जब घटित होते हैं तो उस पर पुलिस कोई एक्शन नहीं ही लेना चाहती है या भारी दवाब आ जाने पर केवल केस दर्ज़ करके इतिश्री कर लेती है, न तो समय से आरोपी को गिरफ्तार करती हैं और न ही चार्जशीट ही समय से तैयार की जाती हैं। 2 साल पहले घटित हुई हाथरस की बेटी के साथ हुए अपराध, उसके बाद पुलिस का व्यवहार और अब तक उसे न्याय न मिल पाना ही एक वजह है कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। माननीय न्यायालय द्वारा भी अति गंभीर मामलों में आरोपी को स्टे दे देना समाज में कानून/पुलिस/कोर्ट फैसले के प्रति भय को खत्म कर रहा है। जाहिर है कि अपराधियों की अपराध करते वक्त ये मानसिक स्थिति रहती होगी कि "उक्त मामले में तो कुछ हुआ नही तो लोग हमारा क्या ही कर लेंगे ?"
दिल्ली के निर्भया कांड जिसने पूरा देश हिला कर रख दिया था, कानून में परिवर्तन भी किए गए मगर तब भी एक अपराधी नाबालिग बनकर कोर्ट से आजाद होकर समाज, न्याय व्यबस्था को मुंह चिढ़ा ही रहा है। महिला अपराध होने पर स्पष्ट, तय शुदा समय में जब तक पुलिस, कोर्ट अपने फैसले/ कार्यवाही नहीं करेंगे, अपराध इसी तरह न्याय व्यवस्था को मुंह चिढ़ाता रहेगा। महिला अपराध पर लगाम लगाने के लिए पुलिस, माननीय न्यायालय को अलग से एक कमेटी बनाने की जरूरत है ताकि केस के बड़े बोझ के चलते हमारी बेटियां अपराधियों के खूनी पंजे से आजाद होकर जी सकें।
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