लेखिकाओं, ख़ासकर नारीवारी लेखिकाओं ने मां, नारी की महिमा पर खूब किताबे लिखी हैं , पुरुष प्रधान समाज, उनकी कठोर व्यवस्था पर भी खूब वर्णन होता रहता है मगर पिता रूपी पुरुष के त्याग, बच्चों ख़ासकर बेटियों के प्रति ममता, समर्पण पर कम ही लिखा गया है या कहें कि खुद पुरूषों ने अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को कम ही जाहिर किया है।
डा मोनिका ने पुरुष प्रधान समाज के भीतर बैठा पिता, भाई, पति रूपी संवेदनामयी पुरुष को भी दिखाने की कोशिश की है और उनकी अभिव्यक्ति बखूबी जाहिर हो भी रही है।
"पिता की दस्तक " पाठ में वो कहती है कि दरवाजे पर पिता की दस्तक..
"सब ठीक हो जायेगा" भर कह देना,
आस की मिठास,
' कोशिश तो करो ' के आदेश में घुला अगुवाई का स्वर
साहस का पदचाप
विफलता के विषाद भरे दौर में पीठ पर मिली थपकी
सम्बल की थाप
'बोलो क्या चाहिए?' पूछते प्रश्न की मनुहार
हर मनोरथ को पूरने वाली संपन्नता का गौरवमयी भरोसा बनी l
ये कविता पढ़कर मुझे अनायास ही पिता और उनके हाथों का स्पर्श, सुरक्षा याद आ गई ...।
पिता रूपी पुरुष की मानवीय संवेदनाओं के वर्णन के साथ साथ किताब के आखिरी कविता "विमंदित सोच" में वो समाज में व्याप्त महिला अपराध, दुष्कर्म पर भी कड़ा प्रहार करती है
"कुत्सित मानसिकता के असंतुलन से उपजी
दुष्कर्म की प्रवृति हो
या हो समाचार
किसी दुष्कर्म पीड़िता के मानसिक संतुलन खो देने का।
दंभी और शोषक सोच से उपजी
दोनो ही विकृत स्थितियां पर्याप्त हैं,
समूची पृथ्वी पर भय के बीज रोपने
अविश्वास के दोलन से संस्कारों की आधारशिला डिगाने
और सम्पूर्ण प्रकृति का पोर पोर दहलाने को।
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